16 दिसंबर को यमुना एक्सप्रेस-वे पर हुए भीषण बस हादसे के बाद कई परिवारों की पीड़ा अब भी खत्म नहीं हुई है। डीएनए रिपोर्ट मैच न होने के कारण अब तक उन्हें आधिकारिक रूप से मृत घोषित नहीं किया जा सका है। इससे परिवार को मुआवजा और मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया है।
16 दिसंबर की वह काली सुबह। यमुना एक्सप्रेस-वे पर पसरा सन्नाटा अचानक चीख-पुकार, धुएं और आग की लपटों में बदल गया। जलती हुई बस के भीतर जो मंजर था, वह शायद कोई भी इंसान जीवन भर न भूल पाए। इसी बस में सवार थी हमीरपुर के गोविंद कुमार अपनी पत्नी पार्वती और उनके दो बच्चे। हादसे के समय बस में सवार पार्वती ने अपने दो बच्चों 8 वर्षीय आकाश और 6 वर्षीय बेटी को खिड़की से बाहर धकेलकर उनकी जान बचाई। बच्चे हादसे के प्रत्यक्षदर्शी हैं।
आकाश ने बताया कि बस में अचानक आग लग गई। हर तरफ धुआं था। लोग चिल्ला रहे थे। मम्मी ने हमें जोर से पकड़ा और खिड़की से बाहर धकेल दिया। वह चिल्लाईं- ‘भाग जाओ!’ हम नीचे गिर गए… मम्मी अंदर ही फंस गईं। हम बाहर खड़े होकर रोते रहे, चिल्लाते रहे, लेकिन आग बहुत तेज थी। कोई अंदर नहीं जा सका और मम्मी हमारे सामने जिंदा जल गईं।
परिवार का कहना है कि बच्चों के बयान, बस में चढ़ाने वाले रिश्तेदार के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्य होने के बावजूद पुलिस उनसे अतिरिक्त सबूत मांग रही है। गोविंद कुमार पिछले दो सप्ताह से मथुरा और हमीरपुर के बीच चक्कर काट रहे हैं। मजदूरी छूटने और इलाज व दौड़-भाग के खर्च के कारण वे करीब 50 हजार रुपये के कर्ज में डूब चुके हैं।
इसी हादसे में जान गंवाने वाले कुछ अन्य पीड़ित परिवार भी इसी स्थिति से गुजर रहे हैं। धौलपुर (बाड़ी) निवासी भोलू के परिजन भी डीएनए मैच न होने के कारण कानूनी प्रक्रिया में फंसे हुए हैं।
इस संबंध में पुलिस को कहना है कि जिन मामलों में डीएनए रिपोर्ट से पहचान नहीं हो सकी है, वहां अन्य वैधानिक साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। टीमों को गांवों में भेजकर जांच की जा रही है ताकि रिपोर्ट के आधार पर मृतकों को कानूनी रूप से मृत घोषित किया जा सके। हादसे में कुल 19 लोगों की मौत हुई थी, लेकिन कुछ परिवारों के लिए अब भी अपनों की मौत कागजों में दर्ज होने का इंतजार बना हुआ है।