
Ear Deformity: हर बच्चे का जन्म अपने माता-पिता के लिए खुशियों की सौगात लेकर आता है। लेकिन कई बार जन्म के समय नवजात शिशु के शरीर में छोटे-मोटे शारीरिक बदलाव या बनावट की विषमताएं देखने को मिलती हैं। इन्हीं में से एक समस्या है शिशुओं के कान की बनावट का सामान्य न होना। कभी कान का ऊपरी हिस्सा मुड़ा हुआ दिखता है, कभी कान बहुत छोटा होता है, तो कभी कान की शेप सामान्य से काफी अलग नजर आती है। इस स्थिति को इयर डिफॉर्मिटी (Ear Deformity) या कान की जन्मजात विकृति कहा जाता है। अक्सर माता-पिता इसे देखकर घबरा जाते हैं या सोचने लगते हैं कि शायद गर्भावस्था के दौरान उनसे कोई चूक हो गई होगी। आइए जानते हैं कि इयर डिफॉर्मिटी क्या है, यह क्यों होती है और इसका इलाज कैसे संभव है।
नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन (NCBI/PMC) के मुताबिक, जब किसी बच्चे के कान का बाहरी हिस्सा (जिसे हम पिन्ना या ऑरिकल कहते हैं) जन्म के समय सही आकार या बनावट में विकसित नहीं हो पाता, तो उसे इयर डिफॉर्मिटी कहा जाता है। कान की इन समस्याओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है; इयर डिफॉर्मिटी (Ear Deformity) में कान के सभी हिस्से और कार्टिलेज (नरम हड्डी) मौजूद होते हैं, लेकिन गर्भावस्था के दौरान किसी दबाव के कारण उनका आकार या शेप बिगड़ जाता है। इयर मालफॉर्मेशन (Ear Malformation) में गर्भावस्था के दौरान कान का कोई हिस्सा सही से बन ही नहीं पाता या पूरी तरह गायब होता है।
क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार बच्चों में कान की बनावट से जुड़ी कई तरह की स्थितियां देखी जा सकती हैं;
1.माइक्रोशिया (Microtia)- इस स्थिति में बच्चे का बाहरी कान बहुत छोटा रह जाता है या पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता।
2. एनोटिया (Anotia)- यह एक दुर्लभ स्थिति है जिसमें बच्चा बिना बाहरी कान के ही पैदा होता है।
3. प्रोमिनेंट इयर (Prominent Ears)- इसमें कान सिर की त्वचा से थोड़ा ज्यादा बाहर की तरफ निकला हुआ नजर आता है।
4. लोप या कफ्ड इयर (Lop or Cupped Ear)- इसमें कान का ऊपरी किनारा अंदर या नीचे की तरफ मुड़ जाता है, जैसे कान मुड़ गया हो।
5. स्टाहल इयर (Stahl’s Ear)- इसमें कान का ऊपरी हिस्सा थोड़ा नुकीला (पॉइंटेड) हो जाता है, जैसा काल्पनिक पात्रों में दिखता है।
क्लीवलैंड क्लिनिक के मेडिकल अध्ययन के अनुसार, इयर डिफॉर्मिटी होने के कई मुख्य कारण हो सकते हैं;
यह इस बात पर निर्भर करता है कि डिफॉर्मिटी किस तरह की है। अगर समस्या केवल कान के बाहरी आकार या कार्टिलेज के मुड़ने की है, तो बच्चे के सुनने की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन अगर बच्चे का कान का छेद (Ear Canal) ही नहीं बना है या अंदरूनी हिस्सा भी प्रभावित हुआ है (जैसा कि माइक्रोशिया या एनोटिया में होता है), तो बच्चे को सुनने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए जन्म के तुरंत बाद बच्चे का 'हियरिंग टेस्ट' (सुनने की जांच) करवाना बेहद जरूरी होता है।
यदि बच्चे के जन्म के शुरुआती 2 से 6 हफ़्तों के अंदर इस समस्या की पहचान कर ली जाए, तो बिना किसी सर्जरी के कान को सही आकार दिया जा सकता है। नवजात शिशु का कार्टिलेज बहुत नरम होता है। डॉक्टर कान पर एक खास प्लास्टिक मोल्ड या स्प्लिंट लगा देते हैं, जिससे कुछ ही हफ्तों में कान सही आकार में आ जाता है। अगर बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया है या कान का आकार काफी ज्यादा विकृत है, तो 5 से 6 साल की उम्र के बाद 'ऑटोप्लास्टी' या रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी की जाती है। इसमें पसलियों (Ribs) की नरम हड्डी या कृत्रिम मटीरियल का इस्तेमाल करके नया कान बनाया जाता है।
जैसे ही बच्चे का जन्म हो, उसके कानों की बनावट को ध्यान से देखें। अगर कान का आकार थोड़ा भी अजीब लगे या मुड़ा हुआ दिखे, तो पहले ही महीने में बाल रोग विशेषज्ञ या ईएनटी (ENT) डॉक्टर को दिखाएं। शुरुआती दिनों में 'इयर मोल्डिंग' के जरिए बिना किसी दर्द और सर्जरी के कान को आसानी से सुंदर और सामान्य आकार दिया जा सकता है।