
Cancer History ACS: आज के समय में जब हम कैंसर का नाम सुनते हैं, तो रूह कांप जाती है। हमें लगता है कि यह भागदौड़ भरी आधुनिक जिंदगी, प्रदूषण, मिलावटी खाने और खराब लाइफस्टाइल की देन है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि कैंसर कोई नई बीमारी नहीं है। अमेरिकन कैंसर सोसाइटी (American Cancer Society) और पीएमसी के अनुसार, यह बीमारी इंसानों का पीछा तब से कर रही है जब न तो कोई फैक्ट्री थी, न प्रदूषण और न ही फास्ट फूड। आइए जानते हैं कि हजारों साल पहले इस बीमारी को पहली बार कब और कैसे पहचाना गया था।
कैंसर का सबसे पहला लिखित सबूत आज से लगभग 5000 साल पहले, प्राचीन मिस्र (Egypt) के एक दस्तावेज में मिलता है, जिसे एडविन स्मिथ पपायरस (Edwin Smith Papyrus) कहा जाता है। यह असल में सर्जरी की एक पुरानी किताब थी। इस दस्तावेज में ब्रेस्ट कैंसर (स्तन कैंसर) के 8 मामलों का जिक्र किया गया था। उस समय ट्यूमर को गर्म औजारों से जलाकर नष्ट करने की कोशिश की जाती थी। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस दस्तावेज के आखिर में लिखा था इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। इसके अलावा, वैज्ञानिकों को प्राचीन ममी की हड्डियों में भी कैंसर (ऑस्टियोसार्कोमा) के निशान मिले हैं।
इस जानलेवा बीमारी को 'कैंसर' नाम देने का श्रेय यूनान (Greece) के मशहूर डॉक्टर हिप्पोक्रेट्स को जाता है, जिन्हें चिकित्सा विज्ञान का जनक (Father of Medicine) भी कहा जाता है। उन्होंने इस बीमारी को समझाने के लिए ग्रीक भाषा के शब्द कार्सिनोस (Carcinos) और कार्सिनोमा (Carcinoma) का इस्तेमाल किया था। ग्रीक भाषा में इसका मतलब होता है केकड़ा (Crab)। अब आप सोचेंगे कि बीमारी का केकड़े से क्या लेना-देना? दरअसल, जब हिप्पोक्रेट्स ने शरीर के भीतर बढ़े हुए ट्यूमर को देखा, तो उसके चारों तरफ फैली हुई नसें बिल्कुल एक केकड़े के पैरों की तरह दिखाई दे रही थीं, जो शरीर को चारों तरफ से जकड़ लेती हैं। बस, तभी से इसका नाम कैंसर पड़ गया।
सैकड़ों सालों तक लोग यह नहीं समझ पाए कि कैंसर आखिर होता क्यों है। यूनान के ही एक डॉक्टर गैलेन का मानना था कि हमारे शरीर में चार तरह के लिक्विड (तरल पदार्थ) होते हैं। उनके मुताबिक, जब शरीर में काला पित्त (Black Bile) जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, तो कैंसर होता है। लगभग 1400 साल तक दुनिया इसी बात को सच मानती रही क्योंकि उस समय शरीर के अंदर देखने के लिए माइक्रोस्कोप (सूक्ष्मदर्शी) जैसी कोई चीज नहीं थी।
19वीं सदी (1800 के बाद) में जब विज्ञान ने तरक्की की और आधुनिक माइक्रोस्कोप का आविष्कार हुआ, तब डॉक्टरों ने जाना कि कैंसर किसी काले पित्त की वजह से नहीं, बल्कि हमारे शरीर की कोशिकाओं (Cells) की खराबी के कारण होता है। उन्होंने देखा कि जब शरीर की कुछ कोशिकाएं पागल हो जाती हैं और बिना रुके लगातार बढ़ने लगती हैं, तो वे ट्यूमर का रूप ले लेती हैं। यहीं से कैंसर के सही इलाज की खोज शुरू हुई।
पहले कैंसर का मतलब सिर्फ मौत समझा जाता था क्योंकि न तो इसके कारणों की समझ थी और न ही इलाज की। लेकिन आज के दौर में विज्ञान ने इस खौफनाक इतिहास को काफी हद तक बदल दिया है। सर्जरी, कीमोथेरेपी, और रेडिएशन जैसी तकनीकों की मदद से अब कैंसर को शुरुआती स्टेज में ही पकड़कर उसका इलाज करना मुमकिन हो चुका है। इतिहास हमें यही सिखाता है कि यह बीमारी भले ही पुरानी हो, लेकिन आज इससे लड़ने के लिए हमारे पास पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हथियार मौजूद हैं।