
Misophonia Symptoms: क्या आपके आस-पास कोई शख्स जब जोर-जोर से चिप्स चबाता है, पेन का ढक्कन बार-बार खटखटाता है, सांस खींचता है या सूप की चुस्कियां लेता है, तो आपका खून खौल उठता है? क्या ऐसी आवाजें सुनते ही आपके मन में अचानक तेज गुस्सा, बेचैनी या वहां से भाग जाने का मन करने लगता है? अगर इन सवालों का जवाब हां है, तो आप सिर्फ चिड़चिड़े नहीं हैं, बल्कि आप एक खास स्थिति पीड़ित भी हो सकते हैं जिसे मेडिकल भाषा में मिसोफोनिया (Misophonia) कहा जाता है। आइए समझतें है कि यह समस्या आखिर क्या है और इसका दिमाग से क्या कनेक्शन है।
मिसोफोनिया का सीधा मतलब होता है- आवाजों से नफरत। यह सिर्फ सामान्य आवाज से होने वाली परेशानी नहीं है, बल्कि कुछ खास तरह की रोजमर्रा की आवाजों (जिसे 'ट्रिगर साउंड्स' कहते हैं) पर दिमाग की एक अत्यधिक तीव्र प्रतिक्रिया है। वेबएमडी के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति ऐसी आवाजें सुनता है, तो उसके दिमाग का 'फाइट ऑर फ्लाइट' (लड़ो या भागो) वाला सिस्टम अचानक एक्टिव हो जाता है। यानी शरीर को ऐसा खतरा महसूस होता है जैसे सामने कोई बड़ी आफत आ गई हो। यही वजह है कि ऐसी आवाजें सुनते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती है, हथेलियों में पसीना आने लगता है और काबू से बाहर गुस्सा आने लगता है।
क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, मिसोफोनिया से पीड़ित हर व्यक्ति के ट्रिगर अलग हो सकते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में ये आवाजें सबसे ज्यादा परेशान करती हैं;
जब कोई पीड़ित इन आवाजों को सुनता है, तो उसे भारी झुंझलाहट, मानसिक अशांति और कभी-कभी खुद पर या सामने वाले पर गुस्सा कंट्रोल न कर पाने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है।
लंबे समय तक लोग इसे महज खराब स्वभाव या गुस्सा मान लेते थे। लेकिन क्लेवलैंड क्लिनिक के विशेषज्ञों का कहना है कि यह न्यूरोलॉजिकल और साइकोलॉजिकल से जुड़ी एक स्थिति है। इसमें कान का पर्दा खराब नहीं होता, बल्कि कान से दिमाग तक आवाज पहुंचाने वाले सिग्नल और भावनाओं को कंट्रोल करने वाले हिस्से (जैसे एमिग्डाला) के बीच का तालमेल अतिसंवेदनशील हो जाता है।
मिसोफोनिया का कोई पक्का इलाज या दवा अभी पूरी तरह तय नहीं है, लेकिन कुछ व्यावहारिक तरीकों से इसे काफी हद तक मैनेज किया जा सकता है;