Desk Job Health Risks: 7 से 8 घंटे की डेस्क जॉब और कम पानी पीना वर्किंग वीमेन को बना रहा पाइल्स व फिशर का शिकार। डॉक्टर और हार्वर्ड रिसर्च से जानिए बवासीर से बचाव के आसान उपाय।
Piles and Fissure in Working Women: आज की आधुनिक कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल ने कामकाजी महिलाओं के सामने कई गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इनमें से एक बड़ी समस्या है पाइल्स (बवासीर) और फिशर। अमूमन इन बीमारियों को बढ़ती उम्र या खराब खानपान से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन हालिया मेडिकल रिपोर्ट्स बताते हैं कि डेस्क जॉब और एसी ऑफिस का माहौल युवा महिलाओं को इसका तेजी से शिकार बना रहा है। लगातार 7 से 8 घंटे एक ही जगह बैठे रहना और शरीर में पानी की कमी होना इस समस्या की सबसे मुख्य वजह है।
MD फिजिशियन डॉ संदीप जोशी के अनुसार लगातार कई घंटों तक चेयर पर बैठे रहने से पेल्विक एरिया (कमर के निचले हिस्से) और मलाशय (Rectum) की ब्लड वेसल्स (रक्त वाहिकाओं) पर लगातार दबाव पड़ता है। इस प्रेशर के कारण वहां की नसें सूज जाती हैं, जिसे मेडिकल भाषा में पाइल्स कहा जाता है।
दूसरी ओर, सेंट्रलाइज्ड एसी ऑफिस में काम करने के कारण महिलाओं को प्यास का अहसास कम होता है। कम पानी पीने से डाइजेशन धीमा हो जाता है और क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन (पुरानी कब्ज) की समस्या पैदा होती है। जब स्टूल (मल) बहुत हार्ड हो जाता है, तो मोशन पास करते समय मलाशय की नाजुक त्वचा छिल या कट जाती है, जिसे फिशर (Fissure) कहा जाता है। इसमें तेज दर्द और ब्लीडिंग की समस्या होती है।
हार्वर्ड हेल्थ पब्लिशिंग (Harvard Health) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना और पर्याप्त मात्रा में लिक्विड डाइट न लेना पाइल्स को ट्रिगर करने वाले सबसे प्रमुख लाइफस्टाइल फैक्टर्स हैं।
इसके अलावा, दुनिया के अग्रणी मेडिकल रिसर्च सेंटर मेयो क्लिनिक (Mayo Clinic) की गाइडलाइंस स्पष्ट करती हैं कि शरीर में पानी की कमी (Dehydration) और कम फाइबर वाला भोजन सीधे तौर पर क्रोनिक कब्ज को जन्म देते हैं, जो आगे चलकर फिशर और बवासीर का मुख्य कारण बनता है। महिलाओं में पीरियड्स और प्रेगनेंसी के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव इस रिस्क को और बढ़ा देते हैं।
डॉ संदीप जोशी ने बताया कि कामकाजी महिलाएं अपनी रोजमर्रा की आदतों में थोड़े से बदलाव करके इस दर्दनाक समस्या से पूरी तरह बच सकती हैं:
डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।