लेपाक्षी मंदिर ( Lepakshi Temple ) के बारे में कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान ब्रिटिश इंजीनियर हैमिल्टन ने भी कुछ इसी तरह की थ्योरी दी थी। साल 1902 में उस ब्रिटिश इंजीनियर ने मंदिर के रहस्य को सुलझाने की कई कोशिशें कीं। इमारत का आधार किस खंभे पर है ये जांचने के लिए इंजीनियर ने हवा में झूलते खंभे पर हथौड़े से भी वार किए।
नई दिल्ली। हमारे दुनिया कई अजीबोगरीब रहस्यों से भरी हुई है। कुछ ऐसा ही रहस्य भारत के एक मंदिर के साथ भी जुड़ा है। यह मंदिर है दक्षिण भारत में जिसके रहस्य को सुलझाने में ब्रिटिशर्स के भी पसीने छूट गए। यह मंदिर पुरातन काल से आज तक लोगों के लिए उत्सुकता का विषय है।
यह मंदिर भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान विभद्र को समर्पित है। आंध्र प्रदेश ( Andhra Pradesh ) के अनंतपुर जिले में स्थित 70 खंभों पर टिका है। लेकिन एक बात आपको हैरत में डाल देगी कि इस मंदिर का एक खंभा जमीन को छूता ही नहीं है, बल्कि हवा में झूलता रहता है।
इसी वजह इस मंदिर को हैंगिंग टेंपल ( Hanging Temple ) के नाम से भी जाना जाता है। कुछ लोगों का मानना था कि 70 खंभों वाला यह मंदिर उस एक झूलते हुए खंभे को छोड़कर बाकी के 69 खंभों पर होगा। इसलिए एक खंभे के हवा में झूलने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता होगा।
इस मंदिर के बारे में ये भी कहा जाता है कि अंग्रेजी शासन काल में ब्रिटिश इंजीनियर हैमिल्टन ( British Engineer Hamilton ) ने भी कुछ इसी तरह की थ्योरी दी थी। साल 1902 में उस इंजीनियर ने मंदिर के रहस्य को सुलझाने की कई कोशिश कीं। इमारत का आधार किस खंभे पर है ये जांचने के लिए इंजीनियर ने हवा में झूलते खंभे पर हथौड़े से भी वार किए।
जिस वजह से तकरीबन 25 फीट दूर स्थित खंभों पर दरारें आ गईं। इससे यह पता चला कि मंदिर का सारा वजन इसी झूलते हुए खंभे पर टिका है। इसके बाद इस पहेली को सुलझाने में लगा इंजीनियर भी मंदिर के झूलते हुए खंभे की थ्योरी के सामने हार मान ली।
इसके अलावा भी मंदिर के साथ कई और कहानियां ( Story ) जुड़ी हुई है, मंदिर के निर्माण को लेकर भी लोगों के अलग-अलग मत हैं। इस धाम में मौजूद एक स्वयंभू शिवलिंग भी है जिसे शिव का रौद्रअवतार अवतार माना जाता है। 1538 में दो भाइयों विरुपन्ना और वीरन्ना ने मंदिर का निर्माण किया था जो की विजयनगर राजा के यहां काम करते थे।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लेपाक्षी मंदिर परिसर में स्थित विभद्र मंदिर का निर्माण ऋषि अगस्त्य ने करवाया था। लेपाक्षी मंदिर के बारे में एक ओर कहानी काफी प्रचलित है। इसके मुताबिक एक बार वैष्णव यानी विष्णु के भक्त और शैव यानी शिव ( Shiva ) के भक्त के बीच सर्वश्रेष्ठ होने की बहस शुरू हो गई। जो कि सदियों तक चलती रही।
इस बहस को रोकने के लिए ही अगस्त्य मुनि ने इसी जगह पर तपस्या की। मुनि ने अपने तपोबल से उस बहस को खत्म कर दिया। उन्होंने ही भक्तों को इस तथ्य से अवगत कराया कि विष्णु और शिव एक दूसरे के पूरक हैं। मंदिर के पास ही विष्णु का एक अद्भुत रूप है रघुनाथेश्वर का। जहां विष्णु, भगवान शंकर की पीठ पर आसन सजाए हुए हैं।
लेपाक्षी मंदिर ( Lepakshi Temple ) के झूलते हुए खंभे के बारे में कहा जाता है कि जो भी श्रद्धालु लटके हुए खंबे के नीचे से कपड़ा निकालते हैं, उनके जीवन में किसी तरह का कोई दु:ख नहीं रहता। परिवार ( Family ) में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।