
Indore news:मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में सड़कों पर दौड़ती डिलीवरी बाइक, कॉलोनियों में सामान पहुंचाते युवा और दिन-रात यात्रियों को मंजिल तक पहुंचाते कैब चालक अब इंदौर की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुके है। मोबाइल ऐप के जरिए मिलने वाले काम ने रोजगार का ऐसा नया मॉडल तैयार किया है, जिसमें हजारों लोग अपनी मेहनत के दम पर कमाई कर रहे है। खास बात यह है कि यह काम अब केवल अतिरिक्त आय का साधन नहीं, बल्कि कई लोगों के लिए आजीविका का प्रमुख जरिया बन गया है।
जानकारों के अनुसार, इंदौर में 20 हजार से अधिक लोग अलग-अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़कर गिग वर्क कर रहे हैं। इनकी औसत मासिक कमाई 15 हजार रुपए मानी जाए तो सभी गिग वर्कर्स की अनुमानित कुल कमाई करीब 30 करोड़ रुपए महीने बैठती है। इस हिसाब से सालाना यह आंकड़ा 360 करोड़ रुपए तक पहुंचता है। यह राशि वर्कर्स की अनुमानित कमाई है, न कि संबंधित कंपनियों का कुल कारोबार।
गिग इकोनॉमी की सबसे दिलचस्प तस्वीर उन युवाओं से सामने आती है, जिन्होंने इसे पार्टटाइम काम के बजाय अपना नियमित रोजगार बना लिया है। उपलब्ध अनुमान के अनुसार, करीब 10 हजार लोग इंदौर में फुलटाइम गिग वर्क कर रहे हैं। इनमें ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने पारंपरिक नौकरी छोड़कर डिलीवरी या कैब चलाने को अपनी कमाई का मुख्य साधन चुना है। फुलटाइम काम करने वाले कई वर्कर्स प्रतिदिन 12 से 13 घंटे तक काम करते हैं। उनकी कमाई ऑर्डर की संख्या, काम के घंटों, प्रोत्साहन राशि और संबंधित प्लेटफॉर्म की भुगतान व्यवस्था पर निर्भर करती है। वहीं, करीब 7 से 8 हजार लोग पार्टटाइम गिग वर्क से जुड़े बताए जाते हैं। नियमित काम के बाद प्रतिदिन 4 से 6 घंटे इस तरह की सेवाएं देते हैं।
शहर में गिग इकोनॉमी का विस्तार केवल व्यावसायिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। अनुमान के मुताबिक, इंदौर की करीब एक हजार कॉलोनियों में अलग-अलग समय पर औसतन 10 से 15 गिग वर्कर्स सक्रिया रहते हैं। राजबाड़ा, रीगल और पलासिया जैसे व्यस्त इलाकों में इनकी मौजूदगी अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है। यह नेटवर्क शहर के बाजारों, रिहायशी कॉलोनियों, कार्यालयों और व्यावसायिक केंद्रों को आपस में जोड़ता है।
गिग वर्क की खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक नौकरी की तरह एक ही नियोक्ता के साथ नियमित रोजगार होना जरूरी नहीं है। आमतौर पर काम ऑर्डर, यात्रा या किसी सेवा के आधार पर मिलता है और भुगतान उसी के अनुरूप होता है। मोबाइल ऐप के जरिए काम मिलने से लोग अपनी उपलब्धता के अनुसार समय चुन सकते हैं, हालांकि वास्तविक लचीलापन प्लेटफॉर्म की शर्तों और मांग पर निर्भर करता है।
गिग इकोनॉमी युवाओं को रोजगार और अतिरिक्त आय के नए अवसर दे रही है। इसके लिए पारंपरिक भर्ती प्रक्रिया से गुजरना या किसी कार्यालय में नियमित उपस्थिति दर्ज कराना हमेशा जरूरी नहीं होता। यही वजह है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग इससे जुड़ रहे हैं। हालांकि, इस मॉडल में लंबे कार्य घंटे, ईंधन और वाहन के रखरखाव का खर्च तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। इंसेंटिव की शर्तें बदलने पर वर्कर्स की आय प्रभावित हो सकती है।
इंदौर में गिग वर्कर्स के बीच फूड डिलीवरी की हिस्सेदारी सबसे प्रमुख है। अनुमान के मुताबिक, करीब 50 प्रतिशत वर्कर्स जोमैटो और स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म के लिए काम करते हैं। शेष वर्कर्स क्विक कॉमर्स, ई-कॉमर्स और परिवहन सेवाओं से जुड़े हैं। इनमें ब्लिकिट, जेप्टो, ओला, उबर और रैपिडो जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। ऑनलाइन ऑर्डर बढ़ने और कम समय में सामान पहुंचाने की प्रतिस्पर्धा ने इस काम की मांग को बढ़ाया है। किराने का सामान हो, रेस्तरां से खाना मंगवाना हो या शहर में एक जगह से दूसरी जगह जाना हो, इन सेवाओं के पीछे बड़ी संख्या में गिग वर्कर्स की मेहनत जुड़ी है।