इंदौर

जब कार्बन डेटिंग की ही नहीं तो पता कैसे चला परमारकाल में बनी भोजशाला? मुस्लिम पक्ष का ASI सर्वे पर सवाल

Dhar Bhojshala : भोजशाला मामले में कमालुद्दीन सोसायटी के वकील ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान एएसआई सर्वे पर सवाल उठाए। उन्होंने कोर्ट में कहा- जब कार्बन डेटिंग हुई ही नहीं है तो कैसे पता चला भोजशाला परमारकाल में बनी थी। बुद्ध की मूर्ति का भी सर्वे रिपोर्ट में कहीं उल्लेख नहीं किया गया।
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Dhar Bhojshala
मुस्लिम पक्ष का ASI सर्वे पर सवाल (Photo Source- Patrika)

Dhar Bhojshala :मध्य प्रदेश के धार जिले की भोजशाला को लेकर हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकार के अधिवक्ता की ओर से एएसआई सर्वे को लेकर कई सवाल उठाए। युगलपीठ में सोमवार को काजी जकुल्ला और मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से रिजॉइंडर पेश करते हुए बहस की गई।

याचिका दायरकर्ता सोसायटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने रिजॉइंडर (प्रति-उत्तर) पेश किया। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के सर्वे पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि हाईकोर्ट के आदेश पर 2024 में जो सर्वे किया गया था, उसमें भोजशाला में मिली शिलाओं, मूर्तियों और अन्य सामग्री की कार्बन डेटिंग नहीं की गई। सर्वे रिपोर्ट में इसका उल्लेख नहीं है। जब कार्बन डेटिंग नहीं हुई तो एएसआई को कैसे पता चला कि, भोजशाला का निर्माण परमारकाल में हुआ?

रिपोर्ट में भगवान बुद्ध की प्रतिमा का उल्लेख भी नहीं

साल 2003 से भोजशाला एएसआई के आधिपत्य में है। इसके एक कमरे पर एएसआई ने कब्जा भी किया हुआ है। इस बात की आशंका को नकारा नहीं जा सकता कि, सर्वे से पहले कुछ वस्तुएं भोजशाला में प्रतिस्थापित कर दी गई हों। सर्वे रिपोर्ट में कई जानकारी को छिपाया गया है। यहां से मिली भगवान बुद्ध की प्रतिमा का उल्लेख भी रिपोर्ट में नहीं किया गया है।

सलमान खुर्शीद की दलील

सोमवार को जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की कोर्ट में दलील देते हुए सलमान खुर्शीद ने आरोप लगाया कि, कोर्ट ने एएसआई को निर्देशित किया था कि, सर्वे में भोजशाला के स्वरूप में किसी भी प्रकार का और कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद सर्वे में दो ओटले हटा दिए गए। एएसआई ने एक ही समय में अलग-अलग स्थानों पर सर्वे किया, ऐसे में मस्जिद पक्ष की ओर से उपस्थित दो लोगों के लिए हर जगह मौजूद होना संभव नहीं था। उन्होंने भोजशाला के मंदिर होने की दलील को नकारते हुए कहा कि कोई साक्ष्य कोर्ट में पेश नहीं किया गया जो ये बात साबित करता हो। प्रतिवादियों ने स्वामित्व को लेकर कोई राहत नहीं मांगी लेकिन ऐसा कोई सबूत भी पेश नहीं किया, जिससे साबित हो कि भोजशाला को तोडकऱ मस्जिद बनाई गई। खुर्शीद ने अन्य याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से मस्जिद के लिए जरूरी वजूखाना और अन्य बातें यहां नहीं होने के तर्क को नकारते हुए कहा कि विवादित स्थान के बीच में एक टैंक है, यही वजूखाना है। इससे पानी की निकासी की व्यवस्था भी है।

काजी जकुल्ला पक्ष के तर्क

काजी जकुल्ला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने प्रतिउत्तर के साथ तर्क रखे। उन्होंने राज्य, केंद्र सरकार सहित अन्य प्रतिवादियों को लेकर कहा कि, भोजशाला को मंदिर बताने वाले खुद असमंजस में हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि वे क्या सिद्ध करना चाहते हैं। वे इस जगह को कभी सरस्वती मंदिर बताते हैं तो कभी पाठशाला। कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया। ये सिर्फ कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकार, एएसआइ और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि, भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर है। एएसआइ ने इसे 29 नवंबर 1951 को संरक्षित इमारत घोषित किया था। 1904 से 28 नवंबर 1951 के बीच इसे संरक्षित इमारत घोषित करने की कोई अधिसूचना नहीं है। इन वर्षों में एएसआइ का भोजशाला को लेकर कोई अधिकारी नहीं था। 24 अगस्त 1935 को धार रियासत ने इसके मस्जिद होने का ऐलान किया था। रियासत के आदेश को सुप्रीम कोर्ट सहित अन्य हाईकोर्ट ने भी अलग-अलग मामलों में मान्य किया है।

आज अंतिम सुनवाई!

एक माह से भी ज्यादा समय से हाईकोर्ट में लगातार चल रही भोजशाला की सुनवाई मंगलवार को पूरी हो सकती है। सोमवार को कोर्ट ने इस मामले में शाम साढ़े पांच बजे तक सुनवाई की। कोर्ट ने सभी पक्षकारों और इंटरविनरों से कहा है कि वे मंगलवार को अपने तर्क पूरे कर लें। सोमवार को मस्जिद पक्ष के अलावा अपीलार्थी काजी जकुल्ला की ओर से भी प्रति-उत्तर पूरे हो गए। अब मंगलवार को कोर्ट अन्य पक्षकारों को सुनेगी।

Updated on:
12 May 2026 08:48 am
Published on:
12 May 2026 08:48 am