
MP Public Service Commission: कठिन दौर केवल हौसलों की परीक्षा लेने आता है और जो हार नहीं मानते, सफलता अंततः उन्हीं के कदम चूमती है। इस कहावत को सच कर दिखाया है झिरन्या मुख्यालय के बलराम नागर और उनकी पत्नी रानी ने। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के घोषित परिणामों में दोनों का एक साथ असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयन हुआ है। यह सफलता केवल एक नौकरी पाने की कहानी नहीं, बल्कि 11 वर्षों के संघर्ष, धैर्य और अटूट विश्वास की प्रेरक गाथा है।
बलराम नागर का बचपन आर्थिक कठिनाइयों में गुजरा। परिवार की स्थिति ऐसी थी कि जीवनयापन के लिए उन्हें ब्राह्मण भिक्षावृत्ति और कथा वाचन जैसे कार्यों का सहारा लेना पड़ा। माता-पिता ने विपरीत परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया।
जब बलराम मात्र छह वर्ष के थे, तब उनके जीवन में झिरन्या के रमेशचंद्र शर्मा और रुक्मिणी बाई का स्नेह मिला। अपनी चार संतान नंदकिशोर, विकास, विनय और शीतल के होते हुए भी उन्होंने बलराम को पुत्रवत अपनाया, शिक्षा दिलाई और संघर्षों से लड़ना सिखाया। बलराम आज भी उन्हें अपने जीवन का सबसे बड़ा मार्गदर्शक और ईश्वर का स्वरूप मानते हैं।
वर्ष 2015 से 2026 तक बलराम ने लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रयास किए। इस दौरान उन्हें कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। एक दशक से अधिक समय तक चले इस संघर्ष में निराशा के क्षण भी आए लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इस पूरी यात्रा में उनकी पत्नी रानी ने हर कदम पर उनका साथ दिया और हौसल बनाए रखा।
मेहनत और धैर्य का परिणाम आखिरकार मिला। बलराम नागर और उनकी पत्नी रानी दोनों का एक साथ असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयन हुआ। यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन गई है। सफलता पर भावुक होते हुए बलराम नागर ने कहा यह उपलब्धि मेरे जन्मदाता माता-पिता मुरलीधर नागर और गायत्री नागर के त्याग, मुझे अपनाने वाले रमेशचंद्र शर्मा एवं रुक्मिणी बाई के आशीर्वाद तथा मेरी पत्नी रानी के अटूट विश्वास का परिणाम है।
-एक साथ दम्पति बने MPPSC अधिकारी
-बलराम नागर और रानी पाटीदार बने सहायक प्राध्यापक
-एक साथ हुआ दोनों का सलेक्शन
-कठिनाइयों में गुजरा बचपन
-भिक्षावृत्ति और कथा वाचन का भी लेना पड़ा सहारा
-11 सालों के लंबे संघर्ष के बाद मिली सफलता
-पूरे परिवार में है खुशी का माहौल
-बलराम बोले- मेरी पत्नी रानी के अटूट विश्वास का परिणाम