इंदौर

Autism: 25 में से 1 बच्चे में दिखते हैं ऑटिज्म के लक्षण, ये 2 संकेत नजर आएं तो पैरेंट्स हो जाएं सावधान

Autism: बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण एक से डेढ़ साल की उम्र में दिखते हैं। समय पर स्क्रीनिंग और थेरेपी से सुधार संभव है, इसलिए अभिभावकों को सतर्क रहना चाहिए।
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Sep 24, 2026
Autism, बच्चे की प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)
Autism, बच्चे की प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)

Indore news: बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के लक्षण अक्सर एक से डेढ़ साल की उम्र के बाद दिखाई देने लगते हैं। बच्चा आंखों में आंखें मिलाने से बचता है, नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया नहीं देता और उम्र के अनुसार उसकी भाषा का विकास नहीं हो पाता। एक ही काम को बार-बार करना और अपनी ही दुनिया में रहना भी इसके प्रमुख संकेतों में शामिल हैं। कुछ बच्चों में सामान्य विकास के बाद पहले सीखी चीजें भूलने की स्थिति भी सामने आती है, जिसे रिग्रेशन कहा जाता है। यह जानकारी ऑटिज्म विशेषज्ञ डॉ. सुभाष गर्ग ने दी। अगर आपका बच्चा आपकी आंखों से आंखे न मिलाए और जवाब न दें तो आपको सावधान रहने की जरूरत है।

जेनेटिक फैक्टर भी है कारण

विशेषज्ञ के अनुसार ऑटिज्म के पीछे जेनेटिक फैक्टर और कुछ पर्यावरणीय कारकों की भूमिका हो सकती है। बच्चों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम, अकेलापन और पोषण से जुड़ी समस्याओं को लेकर भी अभिभावकों को सतर्क रहने की जरूरत है। लॉकडाउन के दौरान बच्चों के स्क्रीन टाइम में बढ़ोतरी और घरों तक सीमित रहने से व्यवहार संबंधी बदलाव देखने को मिले।

पीडियाट्रिशियन से स्क्रीनिंग, जरूरत पर थेरेपी

बच्चे के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान पीडियाट्रिशियन उसके मोटर और सेंसरी विकास की स्क्रनिंग कर सकते हैं। व्यवहार या विकास में असामान्यता दिखने पर आगे विशेषज्ञ की सलाह और थैरेपी जरूरी होती है। ऑटिज्म में कई बार सामान्य जांचों में कोई स्पष्ट शारीरिक समस्या नहीं दिखती, इसलिए बच्चे के व्यवहार और विकास के संकेतों को समझना अहम है। सामाजिक दबाव या अंधविश्वास के कारण इलाज में देरी करने से बचना चाहिए।

जागरुकता के लिए बनाई 'द सेंसरी चाइल्ड'

ऑटिज्म को लेकर जागरुकता और स्वीकार्यता बढ़ाने के उद्देश्य से 'द सेंसरी चाइल्ड' नाम की डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई है। इसमें ऑटिज्म से प्रभावित एक परिवार की यात्रा को दिखाया गया है। इसका उद्देश्य लोगों को ऑटिज्म को समझने और ऐसे बच्चों के साथ समान व्यवहार करने के लिए जागरूक करना है।

दवा नहीं, थैरेपी से सुधार पर जोर

ऑटिज्म की पहचान होने के बाद बच्चे की जरूरत के अनुसार ऑक्यूपेशनल और स्पीच थैरेपी शुरू की जाती है। समय पर थैरेपी मिलने से बच्चे की भाषा, व्यवहार और रोजमर्रा की गतिविधियों में सुधार हो सकता है। देरी होने पर बच्चे को सामाजिक और व्यवहारिक गतिविधियों में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। अभिभावकों को बच्चे के विकास में देरी को यह सोचकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि वह बाद में खुद बोलना या व्यवहार करना सीख जाएगा।

Updated on:
24 Sept 2026 02:44 pm
Published on:
24 Sept 2026 02:44 pm