जबलपुर

“अनुकंपा नियुक्ति ‘संपत्ति का अधिकार’ नहीं”, बेटी की नौकरी का दावा खारिज कर हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला

MP High Court : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बेटी के नौकरी के दावे को खारिज किया, कहा—अनुकंपा नियुक्ति 'संपत्ति का अधिकार' नहीं है।

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अनुकंपा नियुक्ति 'संपत्ति का अधिकार' या नहीं (Photo Source- Patrika)

MP High Court :मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ये स्पष्ट किया कि, अनुकंपा नियुक्ति कोई वंशागत संपत्ति या संपत्ति का अधिकार नहीं जो उत्तराधिकार के माध्यम से प्राप्त होता हो, बल्कि ये एक ऐसी रियायत है जो किसी शोकाकुल परिवार को अचानक उत्पन्न हुई आर्थिक तंगी से बचाने के लिए प्रदान की जाती है। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई एक सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए एक बेटे और एक विवाहित बेटी के बीच परस्पर विरोधी दावों से जुड़ी दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने 4 मई को फैसला सुनाते हुए कहा कि, 'अनुकंपा नियुक्ति कोई विरासत में मिलने वाली संपत्ति या संपत्ति का अधिकार नहीं जो उत्तराधिकार के ज़रिए मिलती हो। ये नियोक्ता द्वारा दी गई एक रियायत है, ताकि शोक संतप्त परिवार को अचानक आई आर्थिक तंगी से बचाया जा सके।' कोर्ट ने आदेश में ये भी कहा कि, 'ये अदालत अनुकंपा नियुक्ति नीति में बाद में हुए उस संशोधन से भी अवगत है जो 2023 में लागू हुआ था। इस संशोधन ने ये स्पष्ट कर दिया कि, विवाहित और अविवाहित लड़की के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। तथापि, ये संशोधन विवाहित पुत्री के बचाव में नहीं आता, क्योंकि मृतक की मृत्यु साल 2020 में हुई थी और याचिकाकर्ता ने स्पष्ट रूप से 2021 में आवेदन किया था। अतः निसंदेह याचिकाकर्ता को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।'

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कोर्ट के नतीजे

-कोर्ट ने पाया कि, रेस्पोंडेंट अथॉरिटीज़ का तरीका पूरी तरह से गलत था।
सबसे पहले, कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट के सभी मामलों में सक्सेशन सर्टिफिकेट की कोई ज़रूरत नहीं है।

-कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट के लिए एप्लीकेशन को प्रोसेस करने के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट पर ज़ोर देना मनमाना और बिना कानूनी अधिकार के है।

-कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट के मामलों में भारत के संविधान के आर्टिकल 226 के तहत इस कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सीमित है।

-कोर्ट अपील अथॉरिटी के तौर पर नहीं है, बल्कि ये जांचता है कि, एडमिनिस्ट्रेटिव कार्रवाई मौजूदा सरकारी पॉलिसी और तय कानूनी सिद्धांतों के पूरी तरह से मुताबिक है या नहीं।

-इस मुकदमे की शुरुआत का मुख्य मुद्दा रेस्पोंडेंट अथॉरिटीज़ द्वारा जनवरी 2024 और फरवरी 2024 के विवादित लेटर जारी करना है, जिसमें विरोधी दावेदारों को कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट के लिए अपने हक का फैसला करने के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट दिखाने का निर्देश दिया गया है। उसका ये कहना कि, वो अपने पति से अलग हो गई है या अलग रह रही है, किसी भी कानूनी कोर्ट के तलाक के आदेश से साबित नहीं हुआ और न ही इस बारे में कोई ठोस डॉक्यूमेंट्री सबूत रिकॉर्ड में है।

-इस तरह, 2014 की पॉलिसी में तय आश्रितों की सख्त लाइन में, मृतक के बेटे को कानूनी प्राथमिकता मिलती है और वो शादीशुदा बेटी के दावे को पूरी तरह से पीछे छोड़ते हुए पहले आता है।

-सरबती ​​देवी और अन्य बनाम उषा देवी में, ये सच है कि, टर्मिनल बेनिफिट्स के लिए सिर्फ नॉमिनेशन से पूरा मालिकाना हक नहीं मिलता और नॉमिनी सिर्फ उत्तराधिकार के कानून के तहत कस्टोडियन के तौर पर काम करता है। ये सिद्धांत फाइनेंशियल एसेट्स और सर्विस एमोल्यूमेंट्स के बंटवारे तक ही सीमित है।

सक्सेशन सर्टिफिकेट क्या है?

-सक्सेशन सर्टिफिकेट एक कानूनी डॉक्यूमेंट है जो सिविल कोर्ट किसी ऐसे मरे हुए व्यक्ति के कानूनी वारिसों को जारी करता है, जिसकी मौत बिना वसीयत के हुई हो।

-इसकी ज़रूरत मुख्य रूप से बैंक अकाउंट, शेयर, म्यूचुअल फंड और कर्ज़ जैसी चल संपत्ति पर दावा करने, ट्रांसफर करने या उसे मैनेज करने के लिए होती है।

-ये सही वारिसों को संपत्ति देते समय ऑर्गनाइज़ेशन को लायबिलिटी से बचाता है।

अनुकंपा नियुक्ति का मामला

ये मामला एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद शुरू हुआ, जो जिला अस्पताल रतलाम में ड्राइवर के पद पर कार्यरत था और 22 जून, 2020 को सेवाकाल के दौरान ही उसका निधन हो गया। उसके बेटे ने दिसंबर 2021 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि, उसकी बहन ने भी इस पर अपना दावा पेश कर दिया और एक कानूनी वारिस तथा आश्रित के तौर पर अपने अधिकारों का दावा किया।

ये विवाद तब और भी बढ़ गया, जब 2024 की शुरुआत में संबंधित अधिकारियों ने निर्देश जारी करते हुए दोनों भाई - बहनों से कहा कि, उनके दावों पर आगे की कार्रवाई करने से पहले वे 'उत्तराधिकार प्रमाण पत्र' (Succession Certificate) पेश करें।

अपने जीवनकाल के दौरान, दिवंगत कर्मचारी ने अपनी सेवा-संबंधी प्राप्तियों (service emoluments) के लिए अपने दो बेटों को नामित किया था। बाद में, ये प्राप्तियां उन बेटों को वितरित कर दी गईं। कर्मचारी की बहन ने इस वितरण पर आपत्ति जताते हुए, एक कानूनी वारिस और आश्रित के रूप में अपने अधिकारों का दावा किया, जिसके परिणामस्वरूप, 'उत्तराधिकार प्रमाण पत्र' प्राप्त करने के लिए सिविल न्यायालय में एक समानांतर कार्यवाही शुरू हो गई।

बहन ने इन पत्रों को चुनौती दी और अपनी नियुक्ति की मांग की, जबकि भाई ने राज्य को अपना आवेदन स्वीकार करने के लिए बाध्य करने के लिए एक मैंडमस की मांग की। याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुए, अधिवक्ता प्रियव्रत सिंह चौहान ने ये दलील दी कि, पूरा परिवार मृतक पिता की आय पर निर्भर था। ये तर्क दिया गया है कि बहन, जो कि एक विवाहित पुत्री है, अपने पति का घर छोड़कर किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रही थी, जिसके चलते पिता ने अपने जीवनकाल में ही उससे सभी संबंध तोड़ लिए थे।

राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए, सरकारी वकील आयुषीमान चौधरी ने ये तर्क देकर इन संचारों को उचित ठहराया कि, 'चूंकि बेटे और बेटी दोनों ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए परस्पर विरोधी दावे प्रस्तुत किए थे, इसलिए विभाग ने वैध उत्तराधिकारियों का पता लगाने के लिए उन्हें 'उत्तराधिकार प्रमाण पत्र' प्रस्तुत करने का निर्देश देकर बिल्कुल सही किया।'

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Published on:
05 May 2026 07:27 am
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