
Bastar Soil Erosion: इन्द्रावती सिर्फ बस्तर की नदी नहीं, बल्कि यहां की खेती, जल सुरक्षा और जैव विविधता की जीवनरेखा है। लेकिन नदी के तटों से लगातार मिट्टी बहने की समस्या अब पर्यावरणीय ङ्क्षचता से आगे बढ$कर बस्तर के लिए ज्वलंत मुद्दा बनती जा रही है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की वर्ष 2020 की रिपोर्ट में कहा गया था कि बारिश के दौरान इन्द्रावती के एक लीटर पानी में करीब 1.97 ग्राम मिट्टी बह रही है। यानी नदी में सिर्फ पानी नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में उपजाऊ मिट्टी भी पहुंच रही है। बारिश के दौरान जब बस्तर पहुंचने वाले पर्यटक चित्रकोट का लाल पानी देख रोमांचित हो उठते हैं वह पानी बस्तर के भविष्य को खोखला कर रहा है।
बारिश के सीजन में ही लाखों टन उर्वरक मिट्टी इंद्रावती के पानी के साथ बह रही है। अब इस समस्या के बीच इन्द्रावती बचाओ अभियान ने इसी खतरे को देखते हुए नदी के दोनों तटों पर 80 हजार पौधे लगाने की मांग की है। अभियान ने कलेक्टर आकाश छिकारा को ज्ञापन सौंपकर पूर्व में किए गए सर्वे और चिन्हांकन के आधार पर पौधारोपण योजना को स्वीकृति देने की मांग की है। ज्ञापन सौंपने वालों में दशरथ कश्यप, किशोर पारख, ट्री मैन सम्पत झा, अप्रतिम झा, रोहित सिंह बैस, शिव नारायण चांडक, सुनील खेडूलकर, लक्ष्मी कश्यप, गाजिया अंजुम, सोनू सोरी सहित अभियान के सदस्य शामिल रहे।
इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने वाले इंंद्रावती बचाओ अभियान का कहना है कि केवल जनजागरण के भरोसे 80 हजार पौधों को बचाना संभव नहीं होगा। नदी तटीय पौधारोपण सामान्य पौधारोपण से अलग है। यहां पौधों का चयन, रोपण की दूरी, प्रजातियों का चयन, मिट्टी और नमी की स्थिति तथा पौधों की सुरक्षा वैज्ञानिक आधार पर तय करनी होगी। इसके लिए वन विभाग की तकनीकी निगरानी और नियमित संरक्षण जरूरी है।
नदी किनारे पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं। इससे बारिश के पानी के साथ मिट्टी के बहाव को नियंत्रित किया जा सकता है। तटों पर हरित पट्टी बनने से नदी में गाद की मात्रा कम करने, कृषि भूमि की ऊपरी उपजाऊ मिट्टी बचाने और नदी के किनारों को स्थिरता देने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा स्थानीय प्रजातियों के पौधे नदी तटीय जैव विविधता के लिए प्राकृतिक आवास तैयार करेंगे। पेड़ कार्बन का अवशोषण करते हैं और स्थानीय तापमान व नमी को संतुलित करने में भी भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञ ²ष्टि से देखें तो नदी में लगातार तलछट यानी सेडिमेंट पहुंचने का असर केवल पानी की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहता। इससे नदी की जलधारण क्षमता, प्रवाह तंत्र और जलीय पारिस्थितिकी पर भी असर पड़ सकता है। वहीं खेतों से उपजाऊ ऊपरी मिट्टी बहने पर कृषि भूमि की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा रहता है। इसीलिए नदी तटों पर पौधारोपण को महज पर्यावरण अभियान के रूप में नहीं, बल्कि सॉयल कंजर्वेशन, वाटर सिक्योरिटी यानी मिट्टी संरक्षण और जल सुरक्षा की संयुक्त रणनीति के रूप में देखे जाने की जरूरत है।
चित्रकोट जल प्रपात का पानी ही मानसून के दौरान लाल इसलिए दिखता है क्योंकि इंद्रावती का पानी प्रपात से नीचे गिरता है और नदी किनारे मानसून के दौरान बड़े पैमाने पर मिट्टी का कटाव होता है। जिन 64 पंचायत को पौधरोपण के लिए तय किया गय है वहां पानी मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए बड़े पेड़ कम हैं। यहां यह भी गौर करना चाहिए कि मानसून के दौरान ही देश के बाकी हिस्सों के पहाड़ी प्रपातों का पानी दूधिया सफेद दिखता है क्योंकि वहां पर कटाव नहीं होता। जिस दिन चित्रकोट का पानी मानसून में भी सफेद दिखने लगे तो यह माना जाए कि पौधरोपण सफल रहा— संपत झा, ट्री मैन
नदी तटों पर पौधारोपण के लिए वर्ष 2020 में जिला प्रशासन ने एक सर्वे करवाया था। पांच ब्लॉक की 64 ग्राम पंचायतों में पौधे लगाने की योजना बनाई गई थी। इनमें बकावंड की 10, लोहांडीगुड़ा की 8, तोकापाल की 8, जगदलपुर की 14 और बस्तर जनपद की 24 पंचायतें शामिल हैं। हालांकि अब आवश्यकता सिर्फ पौधे लगाने की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से पूरे सर्वे को लागू करने और अगले कई वर्षों तक पौधों के संरक्षण की है।