Rajasthan: शादी के कुछ ही साल बाद देश के लिए शहीद हुए जवानों की वीरांगनाओं को सम्मानित किया गया। ये कहानियां त्याग, साहस और राष्ट्रप्रेम की ऐसी मिसाल हैं, जो हर आंख को नम कर देती हैं।
Honored War Widows: सेना दिवस विशेष कार्यक्रमों की कड़ी में भवानी निकेतन कॉलेज परिसर में आयोजित आर्मी मेले के दौरान शौर्य और बलिदान को नमन किया गया। इसमें देश की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर सैनिकों की विरासत को आगे बढ़ाने वाली तीन वीरांगनाओं को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सम्मानित किया। कार्यक्रम में सेना के शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। इस वक्त वीरांगनाओं ने कहा कि, देश सबसे पहले हैं।
खातीपुरा स्थित महाराणा प्रताप नगर निवासी वीरांगना सम्पत कंवर ने भारी मन से बताया कि उनके पति प्रहलाद सिंह शेखावत वर्ष 1986 में सेना में भर्ती हुए थे। दो साल बाद श्रीलंका में चल रहे एक ऑपरेशन के दौरान उन्होंने 29 मई 1988 को वीरगति प्राप्त की। भावुक होते हुए वीरांगना सम्पत कंवर ने बताया कि शहादत के समय उनके पति की उम्र महज 20 वर्ष थी।
शादी को भी ज्यादा समय नहीं बीता था और उनकी बेटी किस्मत भी उस वक्त केवल दो साल की ही थी। श्रीलंका जाते वक्त वे दो दिन के लिए घर आए थे। दो महीने बाद ही उनकी शहादत की खबर आ गई। उन्होंने कहा कि जब भी वह पल याद आता है तो आंखें भर आती हैं। आज भी सबसे गहरा दर्द यही है कि वे अपने पति को अंतिम बार देख तक नहीं सकीं। शहादत के वक्त उनका ट्रक ब्लास्ट में उड़ गया था, जिससे उनका पार्थिव शरीर घर नहीं लाया जा सका। सेना की ओर से केवल उनका सामान ही परिवार को सौंपा गया। उन्होंने कहा, वही सामान आज उनकी आखिरी निशानी है, जिसे सालों से सहेज कर रखा हुआ है। अब उन्हीं यादों के सहारे जिंदगी चल रही है।
सुबेदार मेजर मोहम्मद इकरार खान ने भारी मन से बताया कि वे अपने भाई ग्रेनेडियर मोहम्मद इकराम खान के साथ 6 ग्रेनेडियर रेजिमेंट में सेवा में थे। 7 अप्रैल 2000 को वे ड्यूटी पर तैनात थे। इसी दौरान उन्होंने दो आतंकियों को भागते हुए देखा।
भाई इकराम ने जान की परवाह किए बिना दोनों आतंकियों पर फायरिंग की, जिसमें एक आतंकी मौके पर ही ढेर हो गया, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल होकर झाड़ियों में छिप गया। झाड़ियों में छिपे घायल आतंकी ने इकराम पर फायरिंग शुरू कर दी, लेकिन इसके बावजूद वे रुके नहीं। जवाबी कार्रवाई करते हुए उन्होंने उस आतंकी को भी मौत के घाट उतार दिया।
इस हमले में वे स्वयं गंभीर रूप से घायल हो गए। इलाज के दौरान 12 अप्रैल को उन्होंने वीरगति प्राप्त की। उन्होंने अपने भाई को अपनी आंखों के सामने शहीद होते देखा। वीरांगना बलकेश बानो ने भावुक होते हुए बताया कि शहादत के समय उनकी शादी को महज तीन साल ही हुए थे। उन्होंने कहा कि वे अपने बेटे को भी देश सेवा के लिए सेना में भेजना चाहती हैं। हाल ही में ग्रेनेडियर मोहम्मद इकराम खान को उनके अदम्य साहस और बलिदान के लिए मरणोपरांत शौर्य चक्र से नवाजा गया है। उनके सम्मान में गांव रोहलसाहबसर में शहीद स्मारक भी बनाया गया है। उनके पिता भी सेना में सेवाएं दे चुके थे।
समारोह में नायक आबिद अली को सेना मेडल से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उनकी वीरांगना ने भावुक होते हुए बताया कि अप्रैल 2000 में उनके पति आबिद अली नागालैंड में तैनात थे। 12 अप्रैल को हुई गोलाबारी में वे शहीद हो गए। उन्होंने बताया कि उस समय उनकी शादी को महज दो साल ही हुए थे। अचानक हुए इस हादसे ने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया। भारी मन से उन्होंने कहा, वो आज भी हर पल मेरी यादों में रहते हैं।
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