राजस्थान पुलिस के सबसे चर्चित और बेबाक आईपीएस अधिकारियों में शुमार पंकज चौधरी के प्रमोशन का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। लंबे समय से चल रही कानूनी जंग के बीच अब केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और सकारात्मक रुख अपनाया है।
राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी के प्रमोशन को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की जयपुर बेंच ने इस मामले में दखल देते हुए राज्य सरकार और प्रार्थी आईपीएस के बीच मध्यस्थता (Mediation) का रास्ता अपनाने का निर्देश दिया है। कैट ने एसीएस होम (ACS Home), एसीएस डीओपी (ACS DOP) और आईपीएस पंकज चौधरी को आपसी बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने को कहा है, ताकि पुलिस प्रशासन का कीमती समय बच सके और जनता को बेहतर सेवाएं मिल सकें।
न्यायमूर्ति की बेंच ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए कहा कि प्रार्थी राज्य में एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं और उनके कई मामले समान प्रकृति के लंबित हैं। कैट ने राय दी कि बार-बार कोर्ट के चक्कर काटने से कोर्ट और राजस्थान पुलिस प्रशासन दोनों का समय बर्बाद हो रहा है। अधिकरण ने उम्मीद जताई कि तीन सप्ताह के भीतर आपसी बातचीत से कोई सकारात्मक परिणाम निकलेगा, जिससे एक काबिल अफसर की सेवाओं का उपयोग प्रदेश की जनता के लिए बेहतर तरीके से किया जा सके।
आईपीएस पंकज चौधरी के अधिवक्ता अनुपम अग्रवाल के अनुसार, प्रार्थी के खिलाफ चल रही कुछ जांचों के कारण उनके पिछले तीन प्रमोशन बकाया चल रहे हैं:
पिछली सुनवाई के दौरान कैट ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वह विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) के तहत पंकज चौधरी के बकाया प्रमोशन पर 'प्रोविजनल' (अस्थायी) तौर पर विचार करे। हालांकि, प्रार्थी पक्ष का आरोप है कि राज्य सरकार ने अभी तक इस पर अपना जवाब दाखिल नहीं किया है और न ही कोई ठोस कदम उठाया है।
कैट ने अब गेंद सरकार और पंकज चौधरी के पाले में डाल दी है। अगले तीन सप्ताह राजस्थान पुलिस के इस हाई-प्रोफाइल मामले के लिए निर्णायक साबित होंगे। यदि एसीएस होम और डीओपी के साथ मध्यस्थता सफल रहती है, तो पंकज चौधरी को जल्द ही डीआईजी रैंक की वर्दी में देखा जा सकता है।
कज चौधरी राजस्थान कैडर के 2009 बैच के एक बेहद चर्चित, दबंग और विवादों में रहने वाले आईपीएस (IPS) अधिकारी हैं। वे अपनी ईमानदार लेकिन बेहद सख्त कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं, जिसके कारण उनका करियर कई बार राजनीतिक और प्रशासनिक टकरावों का गवाह बना है।
पंकज चौधरी ने अपनी पुलिसिंग के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है, लेकिन अक्सर उनके कार्यकाल संक्षिप्त रहे:
एसपी जैसलमेर (2013): यहाँ रहते हुए उन्होंने कांग्रेस के कद्दावर नेता गाजी फकीर की हिस्ट्रीशीट दोबारा खोल दी थी, जिसके बाद उन्हें तुरंत पद से हटा दिया गया। यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बना था।
एसपी बूंदी (2014): यहाँ सांप्रदायिक दंगों के दौरान सख्त कार्रवाई और भाजपा नेताओं पर नकेल कसने के कारण उन्हें वसुंधरा सरकार की नाराजगी झेलनी पड़ी और पद से हटा दिया गया।
एसपी कम्युनिटी पुलिसिंग: वे जयपुर मुख्यालय में इस पद पर तैनात रहे, जहाँ उन्होंने 'पुलिस मित्र' जैसे नवाचारों के जरिए जनता और पुलिस के बीच की दूरी कम करने का काम किया।
कमांडेंट, पुलिस ट्रेनिंग स्कूल (झालावाड़/किशनगढ़): उन्हें अक्सर 'लूप लाइन' मानी जाने वाली इन पोस्टिंग में भेजा गया।
पंकज चौधरी का करियर किसी फिल्मी पटकथा की तरह रहा है:
बर्खास्तगी और बहाली: साल 2019 में उन्हें "गंभीर व्यक्तिगत दुराचार" (पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी करने और संतान होने के आरोप) के आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। उन्होंने इस फैसले को कैट (CAT) में चुनौती दी और 2020 में केस जीतकर वापस सेवा में बहाल हुए।
इतिहास का पहला 'डिमोशन': फरवरी 2025 में राजस्थान सरकार ने उनके खिलाफ बड़ा एक्शन लेते हुए उन्हें डिमोशन (पदानवत) कर दिया। वे राजस्थान के इतिहास के पहले आईपीएस बने जिनका प्रमोशन के बजाय डिमोशन किया गया (लेवल 11 से लेवल 10 के वेतनमान पर)।
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