
जयपुर। जयपुर में आयोजित कॉमनवेल्थ देशों के मध्यस्थता (मेडिएशन) सम्मेलन के दूसरे दिन भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत ने विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देते हुए कहा कि आपसी संवाद और समझौता भारतीय संस्कृति की मूल भावना का हिस्सा रहा है। उन्होंने कहा कि अदालतों तक पहुंचने से पहले यदि लोग बातचीत और मध्यस्थता का रास्ता अपनाएं तो कई विवाद आसानी से सुलझ सकते हैं।
सीजेआइ ने कहा कि "समझौते और मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाना हमारी सभ्यता और परंपरा की जड़ों में है। यह कोई नई व्यवस्था नहीं है, बल्कि सदियों से भारतीय समाज का हिस्सा रही है।" उन्होंने कहा कि वर्ष 2023 में मेडिएशन कानून बनने से पहले भी भारत में मध्यस्थता की परंपरा समाज के व्यवहार में मौजूद थी।
अपने संबोधन में सीजेआइ ने दो बहनों और एक संतरे की कहानी सुनाकर मध्यस्थता का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि दोनों बहनें एक ही संतरे पर अपना-अपना अधिकार जता रही थीं। लंबे विवाद के बाद संतरे को आधा-आधा बांट दिया गया, लेकिन बाद में पता चला कि एक बहन को केवल फल खाना था, जबकि दूसरी को केवल उसका छिलका चाहिए था।
उन्होंने कहा कि "अगर दोनों पहले एक-दूसरे की जरूरत समझ लेतीं और बातचीत करतीं तो एक को पूरा फल और दूसरी को पूरा छिलका मिल जाता। मध्यस्थता का उद्देश्य भी यही है कि दोनों पक्षों की वास्तविक जरूरत को समझकर ऐसा समाधान निकले, जिससे सभी संतुष्ट हों।"
सीजेआइ ने कहा कि भारत में मध्यस्थता की अवधारणा नई नहीं है। वेदों, रामायण, महाभारत और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों में भी संवाद और समझौते के जरिए विवाद सुलझाने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। उन्होंने कहा कि, भारतीय इतिहास में हर दौर ने यह संदेश दिया है कि टकराव से बेहतर समाधान बातचीत में छिपा होता है।
अपने संबोधन में सीजेआइ ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कौटिल्य ने शासन व्यवस्था के लिए "साम, दाम, दंड और भेद" के सिद्धांत बताए थे, जिनमें सबसे पहला स्थान "साम", यानी समझाने-बुझाने और सुलह का था। उन्होंने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय दर्शन में भी विवादों के समाधान का पहला विकल्प संवाद और समझौता ही माना गया है।
सीजेआइ ने कहा कि महात्मा गांधी ने भी अपने वकालत के दिनों का सबसे संतोषजनक अनुभव दो पक्षों के बीच समझौता कराने को बताया था। उन्होंने कहा कि गांधीजी का मानना था कि अदालत में फैसला जीत-हार तय कर सकता है, लेकिन मध्यस्थता रिश्तों को भी बचाने का काम करती है।
उन्होंने कहा कि आज न्यायपालिका और विधायिका दोनों मिलकर मध्यस्थता की व्यवस्था को मजबूत कर रही हैं, ताकि लोगों को कम समय में, कम खर्च में और सौहार्दपूर्ण तरीके से न्याय मिल सके।