जयपुर

JLF 2026: नफरत, गुस्से और बदले के दौर में माफी और विनम्रता जरूरी: गोपालकृष्ण गांधी

JLF 2026 : जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखक और प्रशासक गोपालकृष्ण गांधी ने भारत के बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य, इतिहास, माफी, क्षमा और उम्मीद जैसे विषयों पर गहरी और संवेदनशील विचार साझा किए।
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Jan 15, 2026
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JLF 2026: फोटो पत्रिका

जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के फ्रंट लॉन में आयोजित सत्र ‘दी अनडाइंग लाइट: इंडियाज फ्यूचर्स’ में वरिष्ठ राजनयिक, लेखक और प्रशासक गोपालकृष्ण गांधी ने भारत के बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य, इतिहास, माफी, क्षमा और उम्मीद जैसे विषयों पर गहरी और संवेदनशील विचार साझा किए। सत्र का संचालन पत्रकार और लेखिका नारायणी बासु ने किया।

सत्र की शुरुआत गोपालकृष्ण गांधी के प्रशासनिक जीवन के अनुभवों से हुई। उन्होंने कहा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा उनके जीवन का महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण दौर रहा। प्रशासन केवल नियमों से नहीं चलता, बल्कि इसके लिए गलत को गलत कहने का साहस चाहिए। उन्होंने अपने सिविल सेवा साक्षात्कार काल का एक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि यह सेवा व्यक्ति को नैतिक दृढ़ता सिखाती है।

कलाकार मंच पर छुपा लेते हैं अपना दर्द

सत्र में सार्वजनिक जीवन में मिले महान व्यक्तित्वों को भी याद करते हुए उन्होंने कहा कि एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी केवल महान गायिका ही नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील इंसान भी थीं। उनका संगीत श्रोताओं को भीतर तक छू जाता था। उन्होंने कहा कि कलाकार अपने दुःख और संघर्षों को पीछे छोड़कर मंच पर अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं, जिसे दर्शक नहीं देख पाते।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन का उल्लेख करते हुए गांधी ने कहा कि उन्होंने चुनाव आयोग को देश की एक सशक्त संस्था बनाया, हालांकि व्यक्तिगत स्तर पर वे कठिन स्वभाव के थे। सत्ता और पद कभी-कभी व्यक्ति को कठोर बना देते हैं, लेकिन सच्ची आलोचना के सामने सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी पिघल सकता है।

प्लीज, सॉरी और थैंक्स जरूरी

अपने लेखन पर बात करते हुए गांधी ने कहा कि आत्म-ईमानदारी बेहद कठिन है। उन्होंने कहा कि ‘प्लीज’, ‘थैंक यू’ और ‘सॉरी’ जैसे सरल शब्द सबसे मुश्किल होते हैं, विशेषकर तब जब सामने अपना कोई करीबी हो। सच्ची माफी और क्षमा व्यक्ति को भीतर से ठीक करती है।

नफरत और गुस्से का बढ़ता दौर

भारत के वर्तमान हालात पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि आज गुस्सा, बदला और टकराव प्रमुख भावनाएं बन चुकी हैं। अखबारों में ‘स्लैम’ शब्द आम हो गया हैं, जो 30-40 साल पहले इतने प्रचलित नहीं थे। नफरत और बदले की भावना अंतहीन होती है और समाज को भीतर से खोखला करती है।

इतिहास के दुरुपयोग पर चिंता

इतिहास के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि इसे बदले और पीड़ित होने की नई कथाएं गढ़ने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। आज ‘क्षमा’ सबसे दुर्लभ भावना बन गई है। अशोक, विली ब्रांट और ऑस्ट्रेलिया के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि माफी कमजोरी नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति का प्रमाण है। नई पीढ़ी को क्षमा करने की भावना विकसित करनी होगी।

विभाजन सबसे बड़ी त्रासदी

भारत-पाकिस्तान संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि तमाम तनावों के बावजूद दोनों देश हर साल परमाणु प्रतिष्ठानों और कैदियों की सूची साझा करते हैं, जो उम्मीद की एक किरण है। उन्होंने चेताया कि नफरत और पूर्वाग्रह की आग को हवा देना भविष्य की पीढ़ियों के लिए खतरनाक होगा। भारत का विभाजन अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी थी। यह केवल लोगों का नहीं, बल्कि प्रकृति का भी विभाजन था—नदियों, रेगिस्तानों और पारिस्थितिकी तंत्र तक को बांट दिया गया।

सत्र के अंत में उन्होंने ओलंपिक विजेता नीरज चोपड़ा की मां और शतरंज खिलाड़ी गुकेश के उदाहरण देते हुए कहा कि खेल हमें मानवता और विनम्रता का रास्ता दिखाते हैं। उन्होंने कहा भारत की रोशनी मंद जरूर है, लेकिन बुझी नहीं है।

Updated on:
16 Jan 2026 05:07 pm
Published on:
15 Jan 2026 07:04 pm