राजस्थान के राज्य पक्षी और दुनिया के सबसे लुप्तप्राय पक्षियों में शुमार 'गोडावण' (Great Indian Bustard) के संरक्षण की दिशा में मरुधरा ने एक नया इतिहास रच दिया है। जैसलमेर के धोरों में चल रहे 'प्रोजेक्ट जीआईबी' के तहत वह करिश्मा कर दिखाया गया है, जिसका इंतजार वन्यजीव प्रेमी वर्षों से कर रहे थे।
राजस्थान के जैसलमेर स्थित 'संरक्षण प्रजनन केंद्र' (Conservation Breeding Centre) से एक सुखद और गौरवान्वित करने वाली खबर सामने आई है। प्रोजेक्ट गोडावण (Project GIB) ने अपने चौथे वर्ष में प्रवेश करते ही एक बड़ी सफलता हासिल की है। केंद्र में दो नए नन्हे गोडावण चूजों ने जन्म लिया है। इस सफलता के साथ ही राजस्थान में कैप्टिव (बंधक) अवस्था में रह रहे गोडावणों की कुल संख्या बढ़कर 70 हो गई है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस उपलब्धि पर राजस्थान वन विभाग की पीठ थपथपाई है। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पर्यावरण-संवेदनशील नेतृत्व की जीत बताया है।
इस बार की सफलता इसलिए खास है क्योंकि इन दो चूजों में से एक का जन्म प्राकृतिक मिलाप (Natural Mating) से हुआ है, जबकि दूसरे का जन्म आर्टिफिशियल इंसेमिनेशन (AI - कृत्रिम गर्भाधान) तकनीक के जरिए हुआ है।
इस साल का सबसे क्रांतिकारी कदम इन पक्षियों की 'सॉफ्ट रिलीज' (Soft Release) होगा। पिछले चार वर्षों से प्रजनन केंद्र में पाले जा रहे कुछ चुनिंदा चूजों को अब खुले जंगल (Wild) में छोड़ा जाएगा।
एक समय था जब दुनिया भर में गोडावणों की संख्या 150 से भी कम रह गई थी, जिनमें से अधिकांश राजस्थान के डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) में थे। राजस्थान वन विभाग ने वैज्ञानिकों के साथ मिलकर इनके अंडों को प्राकृतिक आवास से सुरक्षित उठाकर उन्हें इनक्यूबेटर में विकसित किया और आज यह संख्या 70 (कैप्टिव) तक पहुँच गई है।
राजस्थान दुनिया का इकलौता ऐसा राज्य है जहाँ गोडावण का सफल 'एक्स-सिटू' (Ex-situ) संरक्षण किया जा रहा है। जैसलमेर का ब्रीडिंग सेंटर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध का केंद्र बन गया है। मुख्यमंत्री और राज्य सरकार ने भी गोडावण के आवास (Habitat) को सुरक्षित करने के लिए हाई-वोल्टेज बिजली लाइनों को अंडरग्राउंड करने और शिकारियों (जैसे आवारा कुत्ते और लोमड़ी) पर लगाम कसने के लिए कड़े कदम उठाए हैं।
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के अनुसार, भारत सरकार और राजस्थान सरकार इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। 'सॉफ्ट रिलीज' की सफलता के बाद आने वाले वर्षों में गोडावणों की आबादी को फिर से उनके पुराने क्षेत्रों (जैसे मध्य प्रदेश और गुजरात के घास के मैदान) में पुनर्जीवित करने की योजना बनाई जा सकती है।