जयपुर

कचरे से ईंटें, प्रदूषण से मुक्ति! IIT जोधपुर की बायो-ब्रिक्स क्रांति, पराली-प्लास्टिक से बनेगी कार्बन-नेगेटिव इमारतें

IIT Jodhpur: कचरे से बनेगा खजाना। आईआईटी जोधपुर ने बायो-ईंटें और एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक विकसित किए। ये पारंपरिक ईंट भट्टों से पूरी तरह अलग हैं – न आग जलानी पड़ती है, न भारी प्रदूषण।
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Apr 14, 2026
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जयपुर. पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में हर साल स्मॉग का कहर और प्लास्टिक कचरे के पहाड़ बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन IIT जोधपुर के वैज्ञानिकों ने इन दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान निकाल दिया है। IIT जोधपुर की टीम ने पराली (पैडी स्ट्रॉ, गेहूं की भूसा, गन्ने की खोई) और प्लास्टिक कचरे को मिलाकर बायो-ब्रिक्स और एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स (APBs) विकसित कर लिए हैं। इस समय भारत दोहरी पर्यावरणीय चुनौती का सामना कर रहा है। पराली जलाने से होने वाला वायु प्रदूषण और प्लास्टिक कचरे का बढ़ता संचय एक प्रमुख कारण हैं। साथ ही बुनियादी ढांचे की बढ़ती मांग भी। यह नवाचार एक समन्वित समाधान प्रदान करता है, जो राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप है।

जितना कार्बन छोड़ती, उससे ज्यादा सोख लेती

Carbon-Negative Bricks

ये ईंटें न सिर्फ मजबूत और किफायती हैं, बल्कि पूरी तरह कार्बन-नेगेटिव हैं। यानी उत्पादन में जितना कार्बन छोड़ा जाता है, उससे ज्यादा सोख लेती हैं। डॉ. प्रियब्रता राउत्रे (असिस्टेंट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ डिजाइन) की अगुवाई वाली टीम ने पेटेंटेड तकनीक विकसित की है।

न आग जलानी पड़ती, न प्रदूषण

बायो-ब्रिक्स को कम ऊर्जा वाली लाइम-बेस्ड प्रक्रिया से बनाया जाता है, जबकि एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स में मिक्स्ड प्लास्टिक वेस्ट (यहां तक कि नॉन-रिक्लेबल मल्टी-लेयर पैकेजिंग) को कृषि अवशेष के साथ हीटिंग और कम्प्रेशन प्रोसेस से जोड़ा जाता है। ये पारंपरिक ईंट भट्टों से पूरी तरह अलग हैं – न आग जलानी पड़ती है, न भारी प्रदूषण।

क्या मिल रहा है इस नवाचार में?

  • कार्बन-नेगेटिव निर्माण: ईंटें लाइफसाइकल में ज्यादा CO₂ सोखती हैं, जिससे नेट-जीरो लक्ष्य में मदद।
  • बेहतर प्रदर्शन: मजबूत, हल्की, बेहतर थर्मल और साउंड इंसुलेशन वाली – बिल्डिंग्स में बिजली बचत होगी।
  • पर्यावरण संरक्षण: पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण रुकेगा, प्लास्टिक कचरा रीसाइकल होगा।
  • आर्थिक फायदा: किसानों को पराली बेचने का नया जरिया, निर्माण क्षेत्र को सस्ता और ग्रीन विकल्प।

क्या काम में ले रहे हैं वैज्ञानिक?

टीम मुख्य रूप से कृषि अवशेष (पैडी स्ट्रॉ, व्हीट स्ट्रॉ, शुगरकेन बैगास) और मिक्स्ड प्लास्टिक वेस्ट को कच्चा माल बना रही है। बायो-ब्रिक्स में लो-एनर्जी लाइम-बेस्ड फॉर्मूलेशन इस्तेमाल होता है, जबकि एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स में प्लास्टिक को एग्री-वेस्ट के साथ फ्यूजन और कम्प्रेशन प्रोसेस से जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया पारंपरिक ईंटों की तुलना में बहुत कम ऊर्जा और उत्सर्जन वाली है।

बड़े पैमाने पर उत्पादन से ईंट भट्टों की संख्या घटेगी

शोधकर्ताओं का कहना है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन से ईंट भट्टों की संख्या घटेगी, किसान-मजदूर दोनों को रोजगार मिलेगा और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा। यह तकनीक सिर्फ लैब तक सीमित नहीं है। इसे राष्ट्रीय स्तर पर स्केल-अप करने की तैयारी चल रही है।

भारत ग्लोबल मॉडल बन सकता है

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार, निर्माण कंपनियां और इंडस्ट्री इसे अपनाती है तो भारत सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर का ग्लोबल मॉडल बन सकता है।यह नवाचार साबित करता है कि समस्या जहां है, समाधान भी वहीं छिपा है। पराली और प्लास्टिक अब बोझ नहीं, बल्कि निर्माण का नया आधार बन रहे हैं।

Updated on:
14 Apr 2026 03:50 pm
Published on:
14 Apr 2026 03:50 pm