जयपुर

Karpoor Chandra Kulish 100th Birth Year : राजस्थान की धड़कनों में कुलिशजी… पत्रकारिता का मूल आधार थी निष्पक्षता

Karpoor Chandra Kulish 100th Birth Year: कर्पूर चन्द्र कुलिश की जन्मशती पर उनकी निष्पक्ष, निर्भीक और पाठक-केंद्रित पत्रकारिता को याद किया गया। कुलिश जी ने समाचार को केवल सूचना नहीं, बल्कि समाज को सोचने, प्रश्न करने और दिशा देने का माध्यम बनाया।
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राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी

Karpoor Chandra Kulish 100th Birth Year : जयपुर, 1977 के आम चुनाव के दौरान राजस्थान पत्रिका से पाठक के रूप में शुरू हुआ मेरा जुड़ाव आज 49 वर्ष बाद भी कायम है और इसके केंद्र में पत्रिका समूह के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चंद्र कुलिश जी की पत्रकारिता रही है। कुलिश जी ने समाचार को केवल सूचना नहीं, बल्कि समाज को सोचने, प्रश्न करने और दिशा देने का माध्यम बनाया। उनके लिए सत्य, सटीकता, निष्पक्षता और जनहित पत्रकारिता के मूल आधार थे।

उन्होंने सत्ता, प्रभाव और दबाव से कभी समझौता नहीं किया तथा गांव, किसान, श्रमिक और दूरस्थ क्षेत्रों की आवाज को भी बराबर महत्व दिया। सरल भाषा, तथ्यपरकता, संतुलन और निर्भीकता ने राजस्थान पत्रिका में पाठकों का गहरा विश्वास भी बनाया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक, विश्वसनीय और प्रेरक बना हुआ है।

प्रेषक : पुनीत कर्नावट, जयपुर

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी का आकर्षक पोट्रेट। चित्रकार के. आनंद

उदयपुर. राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के जन्मशती पर्व पर उदयपुर निवासी डाक विभाग के वरिष्ठ चित्रकार के. आनंद (जी. एल. कलोशिया) ने कुलिशजी को स्मरण करते हुए एक्रेलिक रंगों से इंद्रधनुषी शैली में आकर्षक पोट्रेट बनाया है। उनके अनुसार यह कुलिशजी के प्रति सम्मान और जन्मशती पर्व से जुड़ी आत्मीय श्रद्धांजलि है।

काव्यांजलि…

सोडा में जो जन्मे कर्पूर चन्द्र कुलिशजी नाम से जाने गए, पत्रिका संस्थापक और पत्रकारिता के पुरोधा माने गए। संस्कृति के संवाहक का जन्मशती वर्ष आया, युगद्रष्टव के स्मरण का पावन अवसर लाया। कुलिशजी के कर कमलों से ऐसे अखबार का आगाज हुआ, जो कालांतर में प्रदेश के पाठक की प्रबल आवाज हुआ। भाषा के सरल रूप को समाचारों में अपनाया, आमजन की पीड़ा को पाठकपीठ में लिखवाया।

पीड़ितों को सही सूचना और निष्पक्ष खबरों से न्याय दिलवाया, इसकी खातिर मातृ‌भाषा को कुलिशजी ने पत्रिका में अपनाया। विश्व पटल पर भाषा की सहज तहजीब बतलाई, वैचारिक लेखों में पीड़ितों की सही पैरवी सिखलाई।

कलम के जरिए जब आपातकाल का विरोध किया, पत्रिका के संपादकीय से सच्चा कर्तव्यबोध किया। समाज सेवा और संवेदनशीलता को ध्येय बनाया, लेखों से युवा शक्ति में राष्ट्र निर्माण खूब जगाया। 'सात सैंकड़ा' में वैदिक ज्ञान को निरुपित किया, ब्रहम स्वरूप से आमजन को भी परिचित किया।

वेदों के ज्ञाता और थे विचारों की अ‌द्भुत खान, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दी मजबूती प्रदान। 'धाराप्रवाह' में संघर्षों की गाथा राह दिखलाती है 'वेदविद्या' व 'वेद विज्ञान' वेदों की महिमा बताती है।

'आओ गांव चलें' में गांवों की असली बातें बताई, पत्रिका के स्तंभों में सही मायने ज्ञान-गंगा बहाई। 'पोलमपोल' में भायाजी बन कितनों की पोल खोली, दृष्टिकोण' और 'हस्ताक्षर' में दिखलाई निडर बोली।

अध्यात्म के लेखों में धर्मज्ञान से रूबरू करवाया, येवों के रहस्यों से आम आदमी का परिचय करवाया।

मनोज व्यास, नागौर