
जयपुर।
प्रदेश में 12 फीसदी आबादी के साथ कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहा अल्पसंख्यक वर्ग का अब कांग्रेस से मोह भंग होता जा रहा है। अल्पसंख्यक वर्ग, खासकर मुस्लिम समाज में अंदरखाने कांग्रेस के प्रति नाराजगी देखने को मिलती रहती है। यही वजह है कि पिछले दो विधानसभा चुनावों से कांग्रेस के इस वोट में भाजपा की सेंध लग चुकी है। प्रचंड मोदी लहर में जहां कांग्रेस की ओर से चुनाव मैदान में उतारे गए अल्पसंख्यक नेताओं में से एक भी चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंचा, वहीं भाजपा के मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।
इससे पहले हुए विधानसभा चुनाव में भी भाजपा से दो अल्पसंख्यक नेता चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। जानकार सूत्रों की माने तो प्रदेश में ये ऐसा पहला मौका है जब कांग्रेस से एक भी अल्पसंख्यक नेता चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंचा। इसके बाद से अल्पसंख्यक वर्ग में कांग्रेस के प्रति नाराजगी दिनो दिन बढ़ती जा रही है।
नए चेहरों के नाम पर दिग्गज किनारे
सूत्रों की माने नाराजगी के पीछे एक वजह यह भी है कि कहने को तो कांग्रेस में कद्दावर अल्पसंख्यक नेताओं की पूरी फौज है, जिनमें हमीदा बेगम, अश्क अली टांक, दुर्रू मियां, जकिया, जुबेर खान जैसे चेहरे हैं, लेकिन जुबेर खान को छोड़कर किसी के पास भी संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं है। न तो ये नेता प्रदेश कार्यकारिणी में किसी पद पर हैं और न ही कोई और जिम्मेदारी इनके पास है। हालांकि जुबेर खान को जरूर एआईसीसी सचिव की जिम्मेदारी मिली हुई है।
वहीं संगठन में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के नाम पर दिग्गजों को किनारे कर नए चेहरों को कार्यकारिणी में मौका दिया गया, लेकिन इनकी समाज में कोई खास पकड़ नहीं है, जिसके चलते समाज पार्टी से दूर होता जा रहा है। वहीं दिग्गज नेताओं की नेताओं की अनदेखी होने की चर्चा मुस्लिम समाज के बीच गाहे-बगाहे होती रहती है। जिसके बाद से ये दिग्गज अल्पसंख्यक नेता पार्टी में हाशिए पर हैं। हालांकि ये नेता पूरी शिद्दत से अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में पूरी तरह सक्रिय हैं, लेकिन इन्हें इस बार टिकट मिलेगा या नहीं इस पर संशय है।
स्थानीय के बजाए बाहरी को अहमियत
दरअसल अल्पसंख्यक समाज में कांग्रेस के प्रति बढ़ती नाराजगी की दूसरी वजह ये है भी है कि बीते दो विधानसभा चुनावों से पार्टी ने प्रदेश की कई अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर स्थानीय और जनाधार वाले नेताओं की अनदेखी कर बाहरी नेताओं को टिकट दिया था, जिसके बाद स्थानीय मतदाताओं की नाराजगी का खमियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा था। मुस्लिम बहुल सीटें होने के बावजूद पार्टी प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था।