
उदयपुर के बहुचर्चित कन्हैयालाल हत्याकांड में राजस्थान हाईकोर्ट ने पांच आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल और न्यायाधीश समीर जैन की खंडपीठ का यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि राष्ट्र की संप्रभुता, सुरक्षा और न्याय के सिद्धांतों पर एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया है।
अदालत ने इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को रेखांकित करने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' के विचारों का सहारा लिया। आइए समझते हैं कि आखिर 'जज साहब' ने अपने फैसले में इन महान विभूतियों का जिक्र क्यों किया?
न्यायालय ने फैसले की शुरुआत में महात्मा गांधी के शब्दों को उद्धृत किया: "आतंकवाद और छल-कपट ताकतवर के नहीं, बल्कि कमजोरों के हथियार हैं।"
अदालत ने यह साफ करने के लिए गांधीजी का सहारा लिया कि जो लोग समाज में खौफ फैलाकर या किसी की बेरहमी से हत्या करके खुद को 'ताकतवर' समझते हैं, वे असल में वैचारिक रूप से बेहद कमजोर और डरपोक हैं। एक मजबूत समाज और राष्ट्र कभी भी ऐसी कायरतापूर्ण हरकतों के आगे नहीं झुक सकता। आतंकवाद कभी भी किसी न्यायसंगत अधिकार की आवाज नहीं हो सकता, यह केवल कायरता का प्रदर्शन है।
अदालत ने राष्ट्रकवि दिनकर की कालजयी कविता 'कुरुक्षेत्र' की प्रसिद्ध पंक्तियों का उल्लेख किया:
"सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।"
इन पंक्तियों के जरिए जजों ने स्पष्ट किया कि क्षमा, दया और सहनशीलता जैसे मानवीय गुण तभी मायने रखते हैं जब राष्ट्र के पास दुष्टों को दंडित करने की शक्ति हो। एक संप्रभु राष्ट्र बिना दांत वाले उस सांप की तरह लाचार नहीं हो सकता जो किसी को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। देश की संप्रभुता और सामाजिक शांति की रक्षा के लिए कानून का सख्त और मजबूत होना अनिवार्य है। कानून का डर ऐसा होना चाहिए कि कोई भी देश की शांति भंग करने की हिम्मत न कर सके।
'न्याय की कुर्सी' का अदृश्य बोझ: खंडपीठ ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में कहा कि एक जज की कुर्सी अदृश्य लेकिन अत्यधिक भारी वजन से घिरी होती है—यह वजन देश के नागरिकों के अधिकारों और संविधान की रक्षा करने का है।
शांति की हत्या: कोर्ट ने कहा कि जब कोई अपराध किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे देश की आत्मा पर चोट करता है, तो जमानत के नियम बदल जाते हैं। आतंकवाद सिर्फ एक शारीरिक हमला नहीं है, बल्कि यह देश की मनोवैज्ञानिक संप्रभुता पर एक सुनियोजित और नाटकीय प्रहार है। इसका मकसद सिर्फ अपराध करना नहीं, बल्कि 'शांति की हत्या' करना और 'कानून के शासन' को हटाकर 'भय का शासन' स्थापित करना है।
सख्त कानूनों की जरूरत: कोर्ट ने टिप्पणी की कि एनआईए अधिनियम, 2008 और यूएपीए (UAPA) जैसे सख्त कानून किसी शांति के समय में शौकिया तौर पर नहीं बनाए गए हैं, बल्कि देश की सुरक्षा की 'आवश्यकता की भट्टी' में तपे हुए कानून हैं, जिनका इस्तेमाल ऐसे गंभीर मामलों में सख्ती से होना जरूरी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने गांधीजी के अहिंसा और सत्य के सिद्धांत तथा दिनकर जी के वीरता व न्याय के संदेश को एक साथ जोड़कर समाज को यह कड़ा संदेश दिया है कि भारत की न्याय व्यवस्था शांतिप्रिय जरूर है, लेकिन देश की अखंडता और अमन-चैन को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों से निपटने के लिए उतनी ही कठोर भी है।
उदयपुर का कन्हैयालाल हत्याकांड 28 जून 2022 को हुई एक बेहद स्तब्ध करने वाली घटना है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। उदयपुर के मालदास स्ट्रीट इलाके में पेशे से दर्जी (टेलर) कन्हैयालाल तेली की उनकी ही दुकान में घुसकर दो हमलावरों—मोहम्मद रियाज अत्तारी और गौस मोहम्मद—ने धारदार हथियारों से बेरहमी से हत्या कर दी थी। हमलावरों ने इस जघन्य हत्याकांड का एक वीडियो भी बनाया और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। वीडियो में उन्होंने कन्हैयालाल की हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी धमकी दी थी।
इस हत्या के पीछे की मुख्य वजह एक सोशल मीडिया पोस्ट थी। दरअसल, भाजपा की तत्कालीन राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा एक टीवी डिबेट के दौरान पैगंबर मोहम्मद पर की गई एक विवादित टिप्पणी के समर्थन में कन्हैयालाल के मोबाइल से सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर हो गई थी। इस पोस्ट के बाद कन्हैयालाल को लगातार धमकियां मिल रही थीं, जिसकी शिकायत उन्होंने स्थानीय पुलिस से भी की थी। हत्या के बाद पूरे राजस्थान में तनाव फैल गया था, जिसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए गृह मंत्रालय ने इसकी जांच राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) को सौंप दी थी। एनआईए ने इस मामले को आतंकी कृत्य मानते हुए सख्त यूएपीए (UAPA) कानून के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।