
जयपुर। रामगढ़ बांध तक पानी नहीं पहुंचने की वजह बारिश की कमी नहीं, बल्कि इंसानों की बनाई बाधाएं हैं। सरकार अतिक्रमण हटाने की बात कर रही है, न्यायालय भी बहाव क्षेत्र को मुक्त कराने के निर्देश दे चुका है, लेकिन कैचमेंट में हुए अतिक्रमण, प्राकृतिक ड्रेनेज से छेड़छाड़ और लैंड यूज में बदलाव ने बांध की जीवनरेखा ही काट दी है।
मालवीय राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान (एमएनआईटी) के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. महेश कुमार जाट का कहना है कि यदि मौजूदा और कुछ वर्ष पुरानी सैटेलाइट तस्वीरों का तुलनात्मक अध्ययन कर लिया जाए तो यह साफ हो जाएगा कि पानी के रास्ते कहां रोके गए और रामगढ़ का गला किस तरह धीरे-धीरे घोंटा गया।
इससे पहले देश-दुनिया में कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त जलाशयों और उनके कैचमेंट क्षेत्र के आकलन के लिए जीआईएस, रिमोट सेंसिंग तथा अन्य भू-स्थानिक तकनीकों का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया है। इसी तरह का अध्ययन यदि रामगढ़ बांध के लिए कराया जाता है तो उसके संरक्षण और पुनर्जीवन की दिशा तय करने में मदद मिल सकती है।
वर्ष 1985, 1997, 2015 और 2026 की सैटेलाइट इमेज से स्पष्ट होता है कि रामगढ़ बांध का भराव क्षेत्र धीरे-धीरे घटता गया और वर्तमान में सूखा दिखाई देता है।
ये तस्वीरें फाउन्डेशन ने उपलब्ध करवाई हैं। यदि सरकार विशेषज्ञों से इसी प्रकार की इमेज मैपिंग और वैज्ञानिक स्टडी कराती है तो बहाव क्षेत्र में आई बाधाओं के कारणों का वस्तुनिष्ठ आकलन कर आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं।
"इसरो के सैटेलाइट वर्तमान में 28 सेंटीमीटर तक के रिजॉल्यूशन वाली तस्वीरें उपलब्ध करा रहे हैं। इसमें खर्च भी ज्यादा नहीं आएगा। करीब 25 हजार रुपए में तस्वीरें उपलब्ध हो सकती हैं। यदि एक ही स्थान की अलग-अलग वर्षों की इमेज का विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि कहां प्राकृतिक नालों को पाटा गया, कहां अवैध निर्माण हुए और किन क्षेत्रों में वेस्ट लैंड को कृषि अथवा अन्य उपयोग में परिवर्तित किया गया। इन बदलावों ने जल निकासी तंत्र को प्रभावित किया और बांध तक पहुंचने वाले पानी का प्राकृतिक मार्ग टूट गया।"
-प्रोफेसर डॉ. महेश कुमार जाट,
सिविल इंजीनियरिंग
(एमएनआईटी)
करीब दो दशक से रामगढ़ बांध के संरक्षण, पुनर्जीवन, प्रशासनिक प्रयासों और न्यायिक हस्तक्षेपों के बावजूद अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हुआ?
कैचमेंट (जलग्रहण) क्षेत्र की वास्तविक स्थिति सामने आने पर उसके दीर्घकालिक संरक्षण के लिए किन कदमों की आवश्यकता होगी?
क्या कैचमेंट क्षेत्र के संरक्षण और पुनर्स्थापन के बिना किसी जलाशय का प्रभावी पुनर्जीवन संभव है?
समय के साथ रामगढ़ के कैचमेंट क्षेत्र में क्या-क्या परिवर्तन हुए और उनका वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ आकलन कैसे किया जाए?
लगातार हो रहे क्षरण को देखते हुए समय पर हस्तक्षेप कितना जरूरी है? यदि आवश्यक कदम उठाने में और देरी होती है तो बांध के पुनर्जीवन की संभावनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा?