राजस्थान मानवाधिकार आयोग ने RGHS के तहत कर्मचारियों को इलाज न मिलने को गंभीर मामला मानते हुए इसे मानवाधिकार उल्लंघन बताया। आयोग ने सरकार और संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि अस्पताल, डायलिसिस केंद्र और दवा आपूर्ति में आ रही बाधाएं तुरंत दूर की जाएं।
जयपुर: राज्य मानवाधिकार आयोग ने राजस्थान सरकार के कर्मचारियों को आरजीएचएस के तहत चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराने को गंभीरता से लिया है। आयोग ने इसे सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हुए आरजीएचएस से जुड़े अस्पतालों, डायलिसिस केंद्रों और दवा विक्रेताओं की समस्याओं का तत्काल समाधान करने के निर्देश दिए हैं।
आयोग के अध्यक्ष जी.आर. मूलचंदानी ने 'राजस्थान पत्रिका' में प्रकाशित समाचारों पर प्रसंज्ञान लेते हुए यह आदेश जारी किया। आयोग ने स्पष्ट किया कि आरजीएचएस के विभागीय अधिकारियों और आईएमए के हितधारकों को आपसी समन्वय से बाधाएं दूर करनी चाहिए, ताकि कर्मचारियों को दवाइयां और भर्ती की सुविधा बिना किसी रुकावट के मिल सके।
आयोग ने वित्त सचिव, स्वास्थ्य सचिव, आरजीएचएस सचिव और आईएमए अध्यक्ष से 20 मई तक पूरे मामले पर तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की है। स्वास्थ्य सेवाओं की चरमराती व्यवस्था पर संज्ञान लेते हुए आयोग ने माना कि स्वास्थ्य सेवाएं त्वरित प्रदान करना अनिवार्य है।
आयोग ने जोर दिया कि बकाया भुगतान और नियमों की विसंगतियों को सकारात्मक निष्कर्ष पर पहुंचाया जाए। ताकि कर्मचारियों के मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।
'राजस्थान पत्रिका' ने 29 अप्रैल को 'आरजीएचएस…200 करोड़ रुपए बकाया, सेवाएं प्रभावित' और 1 मई को 'हेल्थ मॉडल वेंटिलेटर पर…'शीर्षक से खबरें प्रकाशित कर कर्मचारियों के इलाज में आ रही बाधाओं को प्रमुखता से उठाया था।
रिपोर्ट में बताया गया था कि पिछले 8-9 महीनों से भुगतान लंबित होने के कारण निजी अस्पतालों और केमिस्टों ने सेवाएं देना बंद कर दिया है।
सीकर जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, कल्याण अस्पताल के पूर्व पीएमओ और वर्तमान में मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. के.के. अग्रवाल को गिरफ्तार किया गया है। उनके साथ एक निजी लैब संचालक डॉ. बनवारी लाल चौधरी उर्फ बी. लाल को भी गिरफ्तार किया गया है।
एसओजी की जांच में सामने आया कि यह पूरा खेल फर्जी एमआरआई रिपोर्ट के जरिए खेला जा रहा था। आरोपी डॉक्टर बिना मरीजों की जांच किए या अस्पताल में अनुपस्थित होने के बावजूद भारी मात्रा में फर्जी कंसल्टेशन स्लिप जारी करते थे।
इसके आधार पर लैब संचालक फर्जी एमआरआई रिपोर्ट तैयार कर आरजीएचएस पोर्टल पर अपलोड करता था और सरकार से करोड़ों रुपए का भुगतान उठा लिया जाता था।
कई मामलों में एक ही मरीज की कई बार एमआरआई दिखाई गई या सामान्य टेस्ट को महंगा 'कॉन्ट्रास्ट एमआरआई' बताकर बिल पास कराए गए।
जांच में पाया गया कि जिस दिन डॉक्टर छुट्टी पर थे, उस दिन भी उनके नाम से पर्चियां काटी गईं।
इस मिलीभगत से सरकारी खजाने को भारी वित्तीय हानि पहुंचाई गई।
इस घोटाले के उजागर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने पहले ही डॉ. के.के अग्रवाल सहित सात डॉक्टरों को निलंबित कर दिया था। अब एसओजी द्वारा आपराधिक मामला दर्ज कर गिरफ्तारियां शुरू कर दी गई हैं, जिससे चिकित्सा विभाग में हड़कंप मच गया है। मामले में अभी और भी बड़े खुलासे होने की संभावना है।