Rajasthan Patrika: 1956 राजस्थान के इतिहास में एक निर्णायक वर्ष रहा। राज्य पुनर्गठन के बाद राजस्थान को एक संगठित प्रशासनिक पहचान मिली। अलग-अलग रियासतों से बने इस विशाल प्रदेश को एक सूत्र में पिरोना बड़ी चुनौती थी।
Karpoor Chandra Kulish 100th Birth Year: 1956 राजस्थान के इतिहास में एक निर्णायक वर्ष रहा। राज्य पुनर्गठन के बाद राजस्थान को एक संगठित प्रशासनिक पहचान मिली। अलग-अलग रियासतों से बने इस विशाल प्रदेश को एक सूत्र में पिरोना बड़ी चुनौती थी। इसी दौर में प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने, शिक्षा और बुनियादी ढांचे को विकसित करने की शुरुआत हुई। उधर 1956 में कर्पूर चन्द्र कुलिश द्वारा राजस्थान पत्रिका की शुरुआत हुई। सीमित संसाधनों के बावजूद अखबार ने जनसरोकार को अपनी पहचान बनाया।
शुरुआती वर्षों में पत्रिका ने ग्रामीण समस्याओं, पानी, कृषि और सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। राजस्थान राज्य अपनी प्रशासनिक और सामाजिक पहचान गढ़ रहा था, वहीं पत्रिका जनचेतना की आवाज बन रही थी। यह वह समय था जब अखबार और समाज के बीच भरोसे का रिश्ता बनना शुरू हुआ, जो दशकों बाद तक उसी भरोसे के साथ जारी है। आज भी पत्रिका की खबरें जनता की आवाज हैं और पाठक का भरोसा उसकी असली ताकत
भारत की स्वतंत्रता की ज्योति ने 15 अगस्त 1947 को पूरे देश को आलोकित किया, लेकिन राजस्थान की धरती पर यह प्रकाश एक लंबी संघर्षपूर्ण प्रक्रिया का प्रतीक था।
रियासतों का विखंडन, राजपरिवारों की महत्वाकांक्षाएं और जनता की एकता की पुकार ये सब मिलकर राजस्थान राज्य के एकीकरण की नींव बने। इसी दौर में, एक सशक्त मीडिया संस्थान का उदय हुआ, जो न केवल राज्य निर्माण की कहानी का साक्षी बना, बल्कि उसे दिशा देने वाला माध्यम भी। राजस्थान पत्रिका की स्थापना और विकास की यह गाथा, राजस्थान के राज्य निर्माण के इतिहास से इतनी गहराई से जुड़ी हुई है कि दोनों को अलग-अलग देखना असंभव है। आज जब हम 2026 में खड़े होकर पीछे देखते हैं, तो यह समांतर यात्रा हमें प्रेरणा देती है कि कैसे एक राज्य की सांस्कृतिक आत्मा और साहसिक पत्रकारिता ने मिलकर 'राजस्थान' नामक एक मजबूत पहचान गढ़ी।
राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया चरणबद्ध रूप से हुई। पहले चरण में 1948 में मत्स्य संघ का गठन हुआ, जिसमें अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली शामिल हुए। दूसरे चरण में राजपूताना मेवाड़ संघ बना, जिसमें उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर आदि रियासतें आई। अंततः 1 मार्च 1956 को आखिरी चरण पूरा हुआ। यह एकीकरण केवल भौगोलिक नहीं था; यह सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक एकता का प्रतीक था। रियासतों के राजा-महाराजाओं ने अपनी शक्तियां समर्पित की और लोकतांत्रिक शासन की नींव पड़ी। 1956 में राजस्थान पत्रिका की स्थापना हुई। श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश ने देखा कि स्वतंत्र भारत में राजस्थान को एक मजबूत आवाज की जरूरत है। राजस्थान पत्रिका इसी जरूरत से जन्मा। इसका पहला अंक सादगीपूर्ण था, लेकिन कुलिश जी का दृष्टिकोण स्पष्ट थाः सत्य, निष्पक्षता और राजस्थान की सेवा।
कुलिश जी ने पत्रिका को राज्य की सेवा का माध्यम बनाया। सांध्य दैनिक के रूप में शुरू हुए पत्रिका ने निर्भीक पत्रकारिता और स्थानीय मुद्दों को आवाज देकर जन विश्वास अर्जित किया। 2026 में, हमारा राजस्थान और राजस्थान पत्रिका दोनों ही अपने 71वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। लाखों पाठकों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सामाजिक अभियानों के साथ यह राजस्थान की धड़कन बना हुआ है।
मेरी उम्र 95 साल है। मैं कर्पूर चन्द्र कुलिश जी से 5 साल ही छोटा हूं। हम साथ चाय पीते थे। मैंने देखा कुलिश जी आम आदमी के लिए ही सोचते रहते थे। मेरे पिताजी जज थे, इसलिए जब हाईकोर्ट की बेंच जोधपुर चली गई तो मैं भी जोधपुर चला गया। मैं मानता हूं कि राजस्थान के विकास में पत्रिका का काफी योगदान है। जब 1977 में हाईकोर्ट की बेंच जयपुर आई, तब मैं 26 साल बाद वापस जयपुर आया।
हम जब वकील थे तो कुलिश जी हमसे विकास के बारे में बातें करते रहते थे। मैंने जोधपुर से जयपुर वापस आने पर यहां की दुर्दशा देखी तो मन दुखी हुआ। जब मैं हाईकोर्ट जज बन गया तो राजस्थान पत्रिका के एक रिपोर्टर ने मुझसे पूछा आप तो खुली चिड़िया हो, यहां आकर बंध गए तो मैंने कहा, मैं कुर्सी को ऊपर नहीं बैठने दूंगा और ऊपर बैठी तो कुर्सी छोड़ दूंगा। जब हाईकोर्ट जज था तो जयपुर में रामनिवास बाग को लेकर फैसला दिया, वह पत्रिका से प्रेरित होकर ही दिया।
मुद्दा था बाग में तांगे-गाड़ी-घोड़े चलेंगे तो पैदल घूमने वालों को परेशानी होगी। मेरे कई फैसलों को पत्रिका ने दिशा दी। मुझे ध्यान है कि फायर वर्क्स वालों को प्रोत्साहन देने के लिए आतिशबाजी कराई, तब मैं जज था। पत्रिका ने सर्वांगीण विकास की सोच के साथ काम किया। जब वकील था तब भी, जब जज बना तब भी और अब भी, राजस्थान पत्रिका मेरी अपनी है। मैं तो प्रत्यक्षदर्शी हूं, मैंने देखा कि पत्रिका की वजह से ऐसे कई काम हुए, जो विकास के लिए आवश्यक थे। जब सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने को लेकर हमारी एम्पावर्ड कमेटी बनाई। कमेटी ने जो रिपोर्ट दी, उसमें राजस्थान पत्रिका और कुलिश जी से मिली जानकारी काम आई।
उस जानकारी के आधार पर ही जयपुर के विकास को लेकर दस रिपोर्ट दीं। उन रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने विकास कार्यों पर मॉनिटरिंग के लिए मामला हाईकोर्ट भेजा और हाईकोर्ट में उसके आधार पर जनहित याचिका दर्ज हुई। वह याचिका अभी भी हाईकोर्ट में विचाराधीन है। खासकर जयपुर को लेकर मेरी वेदना है, इसमें सुधार आना चाहिए और मुझे पूरा भरोसा है जयपुर के लिए पत्रिका ही आगे आएगा। कई अन्य मामलों में जिस तरह पत्रिका ने कोर्ट का ध्यान दिलाया और हाईकोर्ट ने पत्रिका के लिखे पर विश्वास किया, आशा है वह विश्वास आगे भी बना रहेगा।