जयपुर

आईना: जब भीड़ फैसला सुनाने लगे… अनिता बिश्नोई के विषाक्त पदार्थ सेवन के बाद सोशल मीडिया की दुनिया फिर कठघरे में

सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज ट्रोलिंग को सामान्य सामाजिक व्यवहार की तरह स्वीकार किया जाने लगा है। किसी की वेशभूषा पसंद नहीं आई, किसी के विचार स्वीकार नहीं हुए, किसी कीपसंद-नापसंद पर आपत्ति हुई और देखते ही देखते सोशल मीडिया की भीड़ उस पर टूट पड़ती है।

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Jun 06, 2026
anita bishnoi jodhpur
Anita Bishnoi. Photo- anita dinesh bishnoi facebook

जोधपुर की इंफ्लुएंसर अनिता बिश्नोई के विषाक्त पदार्थ सेवन के बाद सोशल मीडिया की दुनिया फिर कठघरे में है। यदि किसी व्यक्ति को इस हद तक ट्रोल किया जाए कि उसे अपना सम्मान, आत्मविश्वास और जीने की इच्छा तक खतरे में महसूस होने लगे, तो यह केवल ट्रोलिंग नहीं रह जाती, यह डिजिटल भीड़ से पैदा हुआ मानसिक उत्पीड़न बन जाती है। इस मामले की जांच अपने निष्कर्ष देगी, लेकिन इतना तय है कि सोशल मीडिया पर बढ़ती भीड़ वाली मानसिकता अब समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की दुनिया को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। इसने आम नागरिक को वह मंच उपलब्ध कराया, जो कभी केवल संस्थाओं, संगठनों या प्रभावशाली वर्गों तक सीमित था। लेकिन इसी मंच का एक स्याह चेहरा भी है, जहां असहमति का जवाब तर्क से नहीं, अपमान से दिया जाता है। जहां विचारों का प्रतिवाद संवाद से नहीं, बल्कि संगठित ट्रोलिंग, गालियों, धमकियों और सार्वजनिक शर्मिंदगी से किया जाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज ट्रोलिंग को सामान्य सामाजिक व्यवहार की तरह स्वीकार किया जाने लगा है। किसी की वेशभूषा पसंद नहीं आई, किसी के विचार स्वीकार नहीं हुए, किसी कीपसंद-नापसंद पर आपत्ति हुई और देखते ही देखते सोशल मीडिया की भीड़ उस पर टूट पड़ती है। हजारों टिप्पणियां, सैकड़ों वीडियो और अनगिनत पोस्ट किसी व्यक्ति को इस तरह घेर लेते हैं मानो न्यायालय का फैसला आ चुका हो।

विडंबना यह है कि यह सब अक्सर संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों की रक्षा के नाम पर किया जाता है। लेकिन भारतीय संस्कृति का मूल स्वर अपमान नहीं, सम्मान है। हमारी सभ्यता संवाद सिखाती है, दमन नहीं। हमारे संस्कार असहमति के बीच भी मर्यादा बनाए रखने का संदेश देते हैं। किसी व्यक्ति का सार्वजनिक चरित्र हनन कर देना न तो संस्कृति की रक्षा है और न ही सामाजिक चेतना का परिचायक।

यह भी उतना ही सच है कि स्वतंत्रता और मर्यादा साथ-साथ चलती हैं। अपने विचार रखने का अधिकार हर नागरिक को है, लेकिन ऐसी अभिव्यक्ति जो अनावश्यक रूप से किसी व्यक्ति, समाज या सांस्कृतिक संवेदनाओं को आहत करे, वह संवाद के बजाय विवाद को जन्म देती है। सामाजिक जीवन में अधिकार और जिम्मेदारी दोनों का समान महत्व है। लेकिन यदि किसी सामग्री या व्यवहार पर आपत्ति है तो उसके लिए कानून हैं, वैधानिक संस्थाएं हैं और न्यायिक प्रक्रियाएं हैं। सोशल मीडिया की भीड़ को न्यायाधीश, अभियोजक और दंडाधिकारी-तीनों की भूमिका निभाने का अधिकार किसी ने नहीं दिया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि ट्रोलिंग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच स्पष्ट रेखा खींची जाए। किसी व्यक्ति, समुदाय या सामाजिक मूल्यों को निशाना बनाकर चलाए जा रहे डिजिटल अभियानों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। समाज को यह तय करना होगा कि वह संस्कृति की रक्षा करना चाहता है या भीड़ के क्रोध को वैधता देना चाहता है। ध्यान रहे, जिस दिन भीड़ फैसला सुनाने लगेगी, उस दिन सबसे पहले न्याय मरेगा, फिर संवाद और अंतत: सभ्यता।

संस्कृति की रक्षा हमारा संकल्प है। सामाजिक मर्यादाओं का सम्मान हमारी जिम्मेदारी है। लेकिन उतना ही आवश्यक है किसी व्यक्ति की गरिमा और सम्मान की रक्षा करना। एक सभ्य समाज दोनों के बीच संतुलन बनाता है, किसी एक को कुचलकर दूसरे को नहीं बचाता। और याद रखिए, ट्रोल की भीड़ कभी समाज नहीं होती। समाज वह होता है जो असहमति में भी मर्यादा और आलोचना में भी मानवता बचाए रखे।

veejay.chaudhary@in.patrika.com
twitter/veejaypress

Updated on:
06 Jun 2026 02:37 pm
Published on:
06 Jun 2026 02:30 pm