— मामला जातिगत समीकरणों के साथ नेताओं की पसंद और नापसंद पर टिका
जयपुर। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष का फैसला दिल्ली और जयपुर के बीच हिचकोले खा रहा है। मामला जातिगत समीकरणों के साथ नेताओं की पसंद और नापसंद पर टिका हुआ है। पसंद ना पसंद के खेल में आरएसएस की सलाह को भी तवज्जो दी जा रही है। पार्टी सूत्रों की मान तो नए प्रदेशाध्यक्ष के नाम के ऐलान में अभी कुछ और वक्त लग सकता है।
भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अभी कर्नाटक दौरे पर हैं। उनके शनिवार शाम तक दिल्ली लौटने की संभावना है। इसके बाद ही राजस्थान प्रदेशाध्यक्ष की कवायद फिर से शुरु होगी। प्रदेश में विधानसभा चुनाव इसी साल होने के कारण पार्टी जातिगत समीकरण को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है। भाजपा के सामने मुख्य चुनौती प्रदेश की चार जातियों के बीच सोशल इंजीनियरिंग की है। इसमें जाट, राजपूत,अजा और ब्राह्मण मुख्य हैं।
पार्टी के नेता चाह रहे है कि पूरी सोशल इंजीनियरिंग करने के बाद ही नए नाम का ऐलान किया जाए। यह भी बताया जा रहा है कि प्रदेशाध्यक्ष के एलान के साथ ही राजस्थान में सत्ता और संगठन स्तर पर सोशल इंजीनियरिंग के तहत और भी बदलाव किए जाएंगे। इसमें मंत्रिमण्डल में फेरबदल के साथ चुनाव संचालन समिति का गठन एक महत्वपूर्ण कदम होगा। इसी तरह का फार्मूला पार्टी मध्यप्रदेश में किए गए बदलाव में लागू कर चुकी है।
प्रदेशाध्यक्ष के नाम को लेकर चली अभी तक की कवायद की बात करे तो भाजपा आलाकमान की पसंद केन्द्रीय राजनीति में सक्रिय गजेन्द्र सिंह शेखावत और अर्जुनराम मेघवाल हैं। जबकि प्रदेश के नेताओं से मिल फीड बैक में इन दोनों नेताओं की संगठनात्मक स्तर पर स्वीकार्यता और पकड़ कमजोर है। इसका नुकसान चुनाव के दौरान भुगतना पड़ सकता हैं। वहीं दूसरी तरफ बात करें चर्चाओं में शामिल अन्य नामों में सतीश पूनिया,अरुण चतुर्वेदी के नाम शामिल है। इन्हें लेकर पार्टी आलाकमान शंकित हैं कि जिस कारण से बदलाव किया जा रहा है यह उसे लेकर सफल होंगे या नहीं।