थार में सदियों पुरानी खड़ीन और बेरियां आज भी जल सुरक्षा की मजबूत ढाल बनी हैं। मुहारकी, रघुनाथसर और हरियासर खड़ीन वर्षाजल सहेज रही हैं, जबकि बेरियां गर्मियों में मीठा पेयजल देती हैं।
जैसलमेर: जल संकट दुनिया के लिए नई चिंता हो सकता है। लेकिन थार के लिए यह सदियों पुराना सच है। तपती रेत, सीमित वर्षा और लंबी गर्मियों के बीच यहां के समाज ने पानी को केवल संसाधन नहीं, बल्कि धरोहर माना। मरूभूमि की पारंपरिक संरचनाएं आज भी टिकाऊ जल प्रबंधन का रास्ता दिखाती हैं।
जैसलमेर और बाड़मेर का मरुक्षेत्र जल संरक्षण की जीवंत प्रयोगशाला रहा है। वर्षा का हर कतरा वरदान समझा गया। बारिश होते ही पानी को रोकने, सहेजने और धरती में उतारने की व्यवस्थाएं सक्रिय हो जाती थीं। छोटी बेरियां, जोहड़, तालाब और विशाल खड़ीनें इसी दूरदर्शी सोच का परिणाम हैं।
पालीवाल ब्राह्मणों ने लगभग सात सौ वर्ष पहले जैसलमेर क्षेत्र में 84 गांव बसाए। इन गांवों की समृद्धि का आधार खड़ीन प्रणाली रही। ढलान वाले भूभाग के सामने मजबूत मेड़ बनाकर वर्षा जल रोका जाता था। पानी खेतों में फैलकर धीरे-धीरे मिट्टी में समा जाता और महीनों तक नमी बनाए रखता।
इसी नमी से गेहूं और चने जैसी फसलें ली जाती थीं। मरुस्थल में कृषि का यह मॉडल उस समय की वैज्ञानिक समझ का प्रमाण था। जैसलमेर क्षेत्र में आज भी कई ऐतिहासिक खड़ीनें सक्रिय या आंशिक रूप से उपयोग में हैं। मुहारकी, रघुनाथसर, हरियासर, लाखोटिया, सोनाट, खेतरड़ी, नवोड़ा, बप, नोवोणी और मसूरड़ी प्रमुख खड़ीनों में शामिल हैं।
काठोड़ी के पूर्व स्थित उपरला ठाड़, सरी, खींया, मूंगल, पदरिया, लाणेला और खाभा क्षेत्र की खड़ीनें भी बरसाती जल संग्रह का बड़ा आधार रही हैं। दामोदर क्षेत्र के पास फैली बुझ झील के आसपास विकसित खड़ीनों ने वर्षों तक आसपास के गांवों की कृषि और पेयजल जरूरतों को सहारा दिया। कोटड़ी, सोडा और सता गांवों की दिशा से बहकर आने वाला जल इन खड़ीनों में समाहित होता रहा है।
खड़ीनें केवल खेती तक सीमित नहीं रहीं। इनके आसपास कुएं, बावड़ियां और तालाब विकसित हुए, जिससे भूजल स्तर संतुलित रहा। वर्षा का पानी रुकने से जमीन के भीतर पुनर्भरण होता और पास की बेरियों में मीठा जल सुरक्षित रहता। यही कारण है कि कई गांवों में आज भी गर्मी के चरम समय में बेरियां पेयजल का भरोसेमंद स्रोत बनी हुई हैं।
रेत की गहराई में संकरी खुदाई कर तैयार की गई ये जलधाराएं वर्षा के बाद छनकर आए पानी को लंबे समय तक सुरक्षित रखती हैं। खुले जलाशयों की तुलना में इनमें वाष्पीकरण कम होता है। सामुदायिक श्रम से इनकी सफाई और संरक्षण की परंपरा विकसित हुई।
हालांकि, वर्तमान में कई खड़ीनों की मेड़ कमजोर हो रही है। रेत जमाव और देखरेख के अभाव में जल धारण क्षमता घट रही है। कुछ बेरियां उपेक्षा का शिकार हैं। जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारंपरिक संरचनाओं का सर्वे कर समय पर मरम्मत, गहरी सफाई और सुदृढ़ीकरण किया जाए तो गर्मियों में जल संकट काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इतिहासवेत्ता डॉ. ऋषिदत्त पालीवाल बताते हैं कि खड़ीन प्रणाली भूजल पुनर्भरण का प्रभावी माध्यम है। वर्षा जल को नियंत्रित कर खेतों में फैलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और आसपास के कुओं का जलस्तर स्थिर रहता है। आधुनिक जल योजनाओं के साथ यदि इन परंपरागत प्रणालियों को जोड़ा जाए तो टिकाऊ समाधान संभव है।
थार ने सदियों पहले साबित कर दिया कि सीमित वर्षा भी पर्याप्त है, बशर्ते उसका प्रबंधन समझदारी से किया जाए। हर बूंद को रजत समान मान सहेजने की संस्कृति ही मरूभूमि की असली ताकत रही है। आज आवश्यकता है इस विरासत को पुनर्जीवित करने की, ताकि आने वाली गर्मियां संकट नहीं, आत्मनिर्भरता का संदेश बनें।