मीडिया के साथ-साथ लोगों का भी कहना है कि भलीभांति वाकिफ होने के बाद भी चार साल से इस अंचल के ग्रामीण खस्ता हाल रोड में चल रहे हैं।
जैजैपुर. मैं जैजैपुर से मालखरौदा को जोडऩे वाली मार्ग हूं। मानसून की पहली फुहार पड़ते ही अपने अस्तित्व का एहसास करा देती हूं। भले ही खेत खलिहानों में पानी भरे या न भरे मुझ पर जलभराव होना मुझ मार्ग की शान है। बारिश हो और मैं मार्ग जलमग्न न होऊ तो बारिश सार्थक कैसे हो सकता है।
पिछली बारिश में मुझको (जैजैपुर-मालखरौदा मार्ग) को लेकर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा काफी जोर आजमाइश किया गया था। राजनेताओं को कोसते रहे, अधिकारियों पर उंगली उठाते रहे। भला मीडिया के कोसने या उंगली उठाने से कुछ होता है क्या। बेचारे थक हार कर बैठ गए और रही बात मेरी तो मैं अपने जगह यथावत ठाट से जैजैपुर और मालखरौदा को पूर्व की भांति जोड़े रखा हूं।
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मीडिया के लोग मुझको (जैजैपुर-मालखरौदा मार्ग) खस्ता हाल होने की संज्ञा देते हुए सांसद एवं विधायक को कोसते रहते हैं। भला इनके कोसने से कुछ थोड़ी न होने वाला है। जहां से राजनेताओं को गुजरना हैं वहां तो मार्ग चमचमाती हुई अपनी क्षेत्र विशेष में होने पर इठलाती है। जहां राजनेताओं के चारपहिया वाहन की चमक भी फीकी न पड़े। मजाल है कीचड़ की कि इनके सफेद पोशाक को उचककर छू ले। मीडिया के साथ-साथ लोगों का भी कहना है कि भलीभांति वाकिफ होने के बाद भी चार साल से इस अंचल के ग्रामीण खस्ता हाल रोड में चल रहे हैं।
भई अंचल में रहने वाले लोगों को ही अंचल के धूप और पानी के साथ-साथ अंचल के अच्छे और बुरे मार्ग पर चलना पड़ता है। अंचल वासियों को छोड़कर बाहर के लोगों को इन सबसे क्या लेना देना। क्षेत्र के लोग कहते हैं कि खराब सड़क की वजह से बच्चों की पढ़ाई लिखाई प्रभावित हो रही है तथा ब्लॉक मुख्यालय आने जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ये तो करना पड़ेगा क्योंकि आप इस अंचल में जो रहते हैं। भले सरकार को चार साल हुए हों या 15 साल हुए हों। इससे आप के सुख-दुख का क्या वास्ता।
मीडिया कहती है लोक निर्माण विभाग द्वारा गड्ढे भरने के नाम पर घटिया मटेरियल का इस्तेमाल किया गया था, जो धूल बनकर उड़ गया । रहा सहा कीचड़ में तब्दील हो गया है। भाई लोक निर्माण विभाग ने अपना काम कर दिया। मिट्टी धूल बनकर उड़ गया तो उड़ गया।कीचड़ बन गया तो बन गया। अगले साल फिर से कर लेंगे। मिट्टी तो उड़ेगा ही, डामर की पक्की सड़क थोड़ी न है जो न उड़े।
जैजैपुर, मालखरौदा मार्ग में मैं एक ग्राम से गुजरता हूं। ग्राम का नाम पिहरीद है। एक जमानें में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिहाज से छोटा नागपुर के नाम से जाना जाता था। जिससे बीजेपी के विधानसभा प्रत्याशी हो या लोक सभा प्रत्याशी अपने चुनाव प्रचार का श्रीगणेश पिहरीद की गणेश परिक्रमा से करते थे। जो अब समय के साथ जातिवाद की राजनीति के चक्कर में किसी अन्य पार्टी का मुख्य केंद्र बना हुआ है।
यहाँ के ग्रामीण अपने परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए मुझमें से मुक्तिधाम तक नही पहुंच पा रहे हैं। जिनके द्वारा अब मेरे ऊपर में (नरोड) में चिता जलाने का निर्णय लिया जा सकता हैं। भाई निर्णय आपका है, क्षेत्र आपका है और तो और वोट भी आपका ही है, तो फिर दूसरों को दोष क्यों। 15 साल हो या 04 साल रहना तो आपको है। मैं तो स्थायी हूँ। या मुझ पर चलो या मुक्ति धाम बनाओ या मुझे संवार दो।