जांजगीर चंपा

डेंगू के डंक से घबराया स्वास्थ्य अमला, काबू पाने गांव-गांव लगा रहा कैंप

- जिले के हर गांवों में डायरिया के विकराल रूप ने स्वास्थ्य विभाग के दावों की पोल खोलकर रख दी है
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डेंगू के डंक से घबराया स्वास्थ्य अमला, काबू पाने गांव-गांव लगा रहा कैंप
डेंगू के डंक से घबराया स्वास्थ्य अमला, काबू पाने गांव-गांव लगा रहा कैंप

जांजगीर-चांपा. जिले में डायरिया के मरीजों की संख्या बढऩे लगी है। मौसम के मिजाज के कारण लोग उल्टी दस्त के शिकार हो रहे हैं। हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि बीते सप्ताह डेंगू से एक की मौत और दो की हालत गंभीर होने के बाद स्वास्थ्य अमला गांवों में कैंप लगा रही है। ताकि महामारी से काबू पाया जा सके।

जिले के हर गांवों में डायरिया के विकराल रूप ने स्वास्थ्य विभाग के दावों की पोल खोलकर रख दी है। स्वास्थ्य विभाग गांवों में दवा वितरण सहित तमाम इंतजाम की बात कर रहा है, लेकिन मरीजों की बढ़ती संख्या ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी नुमाइंदे केवल कोरम पूरा कर औपचारिकता निभा रहे हैं।

बीते एक माह के भीतर जिले की पांच प्रतिशत आबादी उल्टी-दस्त यानी डायरिया की चपेट में है। सबसे अधिक जिला मुख्यालय के आसपास के गांवों में बदहाली चरम पर है। जिला मुख्यालय के अलावा आसपास के गांव मुनुंद, पचेड़ा, कन्हाईबंद, धुरकोट, सिवनी, सरखों सहित दो दर्जन गावों में डायरिया का कहर जारी है। सबसे खराब स्थिति दूरस्थ अंचल के गांवों में इन दिनों डायरिया का कहर जारी है। डेंगू और डायरिया से डर के बाद स्वास्थ्य अमले की कुंभकरणीय नींद खुल गई। अब उन गांवों में कैंप लगाकर लोगों को गोली दवा का वितरण किया जा रहा।

ओआरएस से जान बचाने के दावे
डायरिया से निपटने स्वास्थ्य विभाग के पास पुख्ता इंतजाम नहीं है। गांवों में इस तरह की महामारी से निपटने विभागीय अधिकारी कैंप लगाने की बात कह रहे हैं, लेकिन ग्रामीणों को केवल ओआरएस का घोल देकर काम चलाया जा रहा है। इसके अलावा मरीजों को दी जाने वाली जीवनरक्षक दवाओं को तभी दी जा रही है जब मरीज की हालत नाजुक स्थिति में रहती है। हद तो तब हो जाती है जब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अलावा जिला अस्पतालम के डॉक्टर भी काम चलाउ गोली दवा का उपयोग करते हैं। मरीज की हालत जब बिगडऩे की स्थिति में आती है तो उसे बड़े अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है।

जेनेरिक दवा नहीं कारगर
सरकार भले ही सस्ती दर पर जेनेरिक दवा उपलब्ध करा रही, लेकिन यह दवा जीवन रक्षक के रूप में कारगर साबित नहीं हो रहा। अलबत्ता मरीज सरकारी अस्पतालों में दो चार दिन इलाज कराते हैं इसके बाद जब उनकी तबीयत में सुधार नहीं होता है तो मरीजों को निजी अस्पताल की ओर रुख करते हैं। क्यों कि उन्हें विश्वास नहीं होता कि उनका इलाज शासकीय अस्पताल में अच्छे से हो पाएगा, वहीं निजी अस्पतालों में ब्रांडेड दवा का शुरूआत में इस्तेमाल किया जाता है। इससे मरीज को तत्काल राहत मिलती है। सरकार के सख्ती का असर शासकीय अस्पतालों में देखा जाता है।

- महामारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग के पास पुख्ता इंतजाम है। गांवों में मितानिनों के माध्यम से ओआरएस का पाउच घर-घर बांटे जा रहे हैं। जहां डायरिया के मरीज मिल रहे हैं वहां कैंप लगाया जा रहा है। जिला अस्पताल में भी मरीजों की देखभाल अच्छे से की जा रही है- डॉ. जयप्रकाश, सीएमएचओ

Published on:
26 Aug 2018 04:04 pm
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