Cancer Day 2026 : झुंझुनूं के इमामनगर निवासी जाकिर अली सिद्दीकी (56) की कहानी सिर्फ एक कैंसर सर्वाइवर की नहीं है, बल्कि उस पीड़ा की है जो गुटखा और तंबाकू की एक छोटी-सी पुड़िया इंसान को जिंदगी भर के लिए दे जाती है।
झुंझुनूं। झुंझुनूं के इमामनगर निवासी जाकिर अली सिद्दीकी (56) की कहानी सिर्फ एक कैंसर सर्वाइवर की नहीं है, बल्कि उस पीड़ा की है जो गुटखा और तंबाकू की एक छोटी-सी पुड़िया इंसान को जिंदगी भर के लिए दे जाती है।
मई 2009 की बात है, जाकिर के मुंह में छाले हुए। खाना खाते समय असहनीय दर्द होने लगा। इससे पहले 20 साल से गुटखा उनकी जिंदगी का हिस्सा था। भोजन भले छूट जाए, लेकिन गुटखा नहीं। जांच कराई तो जो सच सामने आया, उसने पूरे परिवार की नींव हिला दी, जाकिर को कैंसर था। इसके बाद इलाज, ऑपरेशन, दवाइयों पर लाखों रुपए खर्च हो गए।
ऑपरेशन के बाद चेहरा बिगड़ गया। आज भी खाने-पीने में परेशानी होती है। आईने में खुद को देखना आसान नहीं रहा। लेकिन यहीं से जाकिर की जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। उन्होंने एक संकल्प लिया और पिछले 16 वर्षों में 800 से अधिक लोगों को गुटखा-तंबाकू की लत से बाहर निकाल चुके हैं।
आज जब जाकिर किसी को गुटखा खाते देखते हैं, तो डांटते नहीं, डराते नहीं, वह गिड़गिड़ाते हुए कहते हैं ‘भाई, थोड़ा सा गुटखा मुझे भी खिला दो…’ सामने वाला चौंकता है। तभी जाकिर अपना चेहरा सामने कर देते हैं। फिर जेब से एक पुरानी तस्वीर निकालते हैं और कहते हैं कि ‘देखो, मैं पहले ऐसा था… और अब ऐसा हूं। यह सब इसी गुटखे की वजह से हुआ।’ कई लोग वहीं टूट जाते हैं।
कई की आंखें भर आती हैं। कई उसी पल कसम खा लेते हैं, आज के बाद गुटखा नहीं…। इतना ही नहीं, वह उन लोगों के घर तक जाते हैं, उनके पत्नी, बच्चों को बताते हैं कि यह लत कैसे पूरे परिवार को बर्बाद कर देती है।
जाकिर कहते हैं ‘गुटखा खाने वाले कई लोगों को तो मेरा चेहरा देखने के बाद रातभर नींद नहीं आती। उनकी आंखों के सामने मेरा ही चेहरा घुमता रहता है। लेकिन अगर मेरा बिगड़ा हुआ चेहरा किसी एक इंसान को भी गुटखा छोड़ने पर मजबूर कर दे, तो मेरी तकलीफ सफल है।’