भारत-पाक युद्ध 1971 में शहीद हुए शेखावटी के वीर सपूत धर्मपाल डूडी के परिजनों तक बांग्लादेश का सम्मान पत्र 8 साल बाद पहुंचा है। साल 2018 में शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहते हुए बांग्लादेश सरकार की ओर से राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह व प्रशस्ति पत्र जारी किया गया था।
झुंझुनूं। राजस्थान की वीरभूमि झुंझुनूं जिले के धींधवा गांव के शहीद धर्मपाल डूडी की शहादत को 55 साल बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है। 1971 के भारत-पाक युद्ध में अदम्य साहस दिखाने वाले इस वीर जवान को बांग्लादेश सरकार ने ‘विशेष प्रशस्ति पत्र’ और ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न’ देकर सम्मानित किया है। भारतीय सेना के अधिकारियों ने जब यह सम्मान उनके पैतृक गांव पहुंचाकर परिवार को सौंपा, तो गांव में भावुक माहौल बन गया और चारों ओर 'शहीद धर्मपाल अमर रहें' के नारे गूंज उठे।
दरअसल, यह प्रशस्ति पत्र बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना और राष्ट्रपति मोहम्मद अब्दुल हमीद के हस्ताक्षरों के साथ 27 नवंबर 2018 को जारी किया गया था। हालांकि प्रशासनिक और सैन्य प्रक्रियाओं के कारण इसे शहीद के परिवार तक पहुंचने में 8 वर्ष लग गए। अंततः गुरुवार को भारतीय सेना की 65 मीडियम रेजिमेंट के अधिकारी लेफ्टिनेंट विक्रांत, हवलदार रामबीर और अग्निवीर जीतू सिंह यह सम्मान लेकर धींधवा गांव पहुंचे।
सम्मान सामग्री शहीद के भाई अमर सिंह डूडी को सौंपी गई। इस मौके पर शहीद परिवार के अमर सिंह डूडी, शुभकरण, सत्यवीर, विजेंद्र, अनिल कुमार, वीर सिंह, सुनील, मयंक डूडी और जसविका सहित ग्रामीण मौजूद रहे। इस दौरान गांव स्थित शहीद स्मारक पर अधिकारियों व जवानों ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
1971 के युद्ध के दौरान ढाका के अखौरा सेक्टर में भीषण लड़ाई चल रही थी। उस समय धर्मपाल डूडी महज 22 वर्ष के थे और रेडियो ऑपरेटर के रूप में अग्रिम मोर्चे पर तैनात थे। 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना की ओर से हुए भारी हमले में वे गंभीर रूप से घायल हो गए।
शरीर से लगातार खून बह रहा था, लेकिन उनका हौसला कमजोर नहीं पड़ा। उन्होंने घायल अवस्था में भी अपना रेडियो सेट नहीं छोड़ा और लगातार दुश्मन के ठिकानों की सटीक जानकारी भारतीय तोपखाने तक पहुंचाते रहे। उनकी सूचना के आधार पर भारतीय सेना ने पाकिस्तानी ठिकानों पर प्रभावी बमबारी की। अंततः 4 दिसंबर 1971 को मातृभूमि के लिए लड़ते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
धर्मपाल डूडी 13 जनवरी 1970 को भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। उनके अदम्य साहस और बलिदान को सम्मान देते हुए सेना की 65 मीडियम रेजिमेंट की एक बैट्री का नाम ‘शहीद धर्मपाल बैट्री’ रखा गया है, जो किसी भी सैनिक के लिए बड़ी गौरवपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। भारत सरकार भी उन्हें पहले ‘पूर्वी स्टार’ से सम्मानित कर चुकी है।
शहीद धर्मपाल ऐसे परिवार से थे, जहां देशसेवा की परंपरा रही है। सात भाइयों में से छह ने सेना में सेवाएं दीं। आज भी गांव और परिवार को अपने इस वीर सपूत पर गर्व है, जिसकी बहादुरी की गाथा आज भी लोगों को प्रेरित करती है।