
जोधपुर. वानिकी पर शोध करने वाले शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (आफरी) द्वारा दक्षिण भारत से चंदन के पौधों को राजस्थान व गुजरात में लाकर उगाया जाएगा। पांच साल के अध्ययन के बाद चंदन की बेहतरीन किस्म विकसित की जाएगी। इसका आनुवंशिकी अध्ययन कर इसकी खेती के मानक तय किए जाएंगे। उसके बाद यहां के वातावरण में भी चंदन हो सकेगा।
देश में प्राकृतिक रूप से चंदन दक्षिण भारत के पांच राज्यों केरल, तमिलनाडू, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में होता है। चंदन तस्कर वीरप्पन ने वहां चंदन के जंगलों को नष्ट कर दिया। अब केवल केरल के मय्यूर क्षेत्र में ही प्राकृतिक चंदन बचा हुआ है। चंदन को बचाने के लिए उसे उत्तर भारत की तरफ लाया जा रहा है। आफरी के वैज्ञानिक डॉ. महेश्वर हेगड़े, डॉ. नवीन बोहरा और डॉ. तरुणकांत ने यह परियोजना तैयार की है। डॉ. बोहरा ने बताया कि चंदन के पौधे में 16 साल बाद हार्ड वुड होती है। ऐसे में प्रत्येक पौधे की डेढ़ दशक तक सार संभाल करनी पड़ेगी। एक पौधे से 5 से 6 किलो हार्ड वुड प्राप्त होती है। इससे चंदन का तेल निकलता है। बाजार में चंदन के तेल की कीमत 2 लाख रुपए प्रति किलो है।
अरावली में वन सम्पदा बढ़ाने चाहते हैं वन अधिकारी
आफरी में बुधवार को आयोजित शोध परामर्शी समूह की बैठक में अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. एमएल मीणा ने अरावली में वन सम्पदा बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने शोध में नवीनता लाने की बात कही। आफ री निदेशक डॉ. इन्द्रदेव आर्य ने बताया कि इस वर्ष 5 नई परियोजनाएं प्रस्तुत की जा रही है। आईसीएफआरई देहरादून के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. विमल कोटियाल, आफ री की समूह समन्वयक (शोध) डॉ. रंजना आर्य, राजस्थान जैव विविधता बोर्ड के पीके उपाध्याय, रघुवीर सिंह शेखावत, जेएनवीयू वनस्पति विभाग के पूर्व एचओडी डॉ. नरपत सिंह शेखावत, वर्तमान एचओडी डॉ. पवन कसेरा, बीएसआई प्रभारी डॉ. विनोद मैना, काजरी के डॉ. जेसी तिवारी, डॉ. प्रवीण कुमार, डीएसटी से डॉ. पारुल और डॉ. संगीता त्रिपाठी शामिल हुई।
पांच नई शोध परियोजनाएं
आफरी ने इस साल पांच नई शोध परियोजनाएं बनाई हैं। इसमें उत्तर-पश्चिमी भारत में चंदन की खेती करने, विलायती बबूल से अन्य फसलों में मदद लेने, जैव उर्वरकों का उपयोग कर संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा करने, मरुस्थल में कंकेड़ा की खेती करने और खनन प्रभावित क्षेत्रों का पुनस्र्थरीकरण करने के प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए।