फतहसागर और उसके बाद गुलाबसागर को खाली करने की शुरुआत इस बात का संकेत है कि शहर की जल विरासत को लेकर सरकार और प्रशासन गंभीर हो रहे हैं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया को केवल जल निकासी और सफाई तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
संदीप पुरोहित
जोधपुर। फतहसागर, गुलाबसागर, चतुरसागर और उम्मेदसागर जैसे जलाशय कभी जोधपुर की जल संरचना, पर्यावरण और सामाजिक जीवन के केंद्र हुआ करते थे। समय के साथ अनियोजित विकास, अतिक्रमण, सीवरेज और गंदगी ने इन जलाशयों की हालत खराब कर रखी है। आज आवश्यकता है इन जलाशयों को पुनर्जीवन देने की। राजस्थान पत्रिका लंबे समय से मांग उठाता रहा है। हमने कई अभियान भी चलाए। आखिरकार सरकार ने एक सकारात्मक और जरूरी कदम उठाया है। जो बहुत देर से उठाया गया, पर देर आए दुरुस्त आए।
फतहसागर और उसके बाद गुलाबसागर को खाली करने की शुरुआत इस बात का संकेत है कि शहर की जल विरासत को लेकर सरकार और प्रशासन गंभीर हो रहे हैं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया को केवल जल निकासी और सफाई तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। यह अवसर है कि शहर इन ऐतिहासिक जलाशयों को नए विजन के साथ विकसित करने का, पर उससे पहले आने वाली चुनौतियों से निपटने को भी हमें तैयार रहना होगा। पानी का निकास बहुत बड़ी चुनौती है। सीवर लाइन को नुकसान नहीं हो। यह ध्यान रखना होगा कि वहां के वाशिंदों को भी कोई परेशानी नहीं हो। पर बड़े मामलों में छोटी-मोटी परेशानी को नजरअंदाज भी करना होगा, तभी यह पावन कार्य संपन्न हो पाएगा।
खाली होने के बाद हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि जलाशयों का पानी दोबारा दूषित नहीं हो। पहले जो पानी यहां आता था, उसने वर्षों तक जल गुणवत्ता और इकोसिस्टम को नुकसान नहीं पहुंचाया। हमें वही स्थिति फिर पैदा करनी होगी। तभी सकारात्मक परिणाम आएंगे। तभी फतहसागर और गुलाबसागर में आने वाला पानी पूरी तरह स्वच्छ और उपयोगी होगा। चाहे वह नहरों के माध्यम से आए या अन्य प्राकृतिक स्रोतों से, उसकी गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यदि साफ पानी की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हुई, तो पूरा प्रयास केवल अस्थायी सुधार बनकर रह जाएगा।
दूसरा बड़ा पक्ष इन जलाशयों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का है। जोधपुर पहले से ही पर्यटन मानचित्र पर मजबूत पहचान रखता है, लेकिन शहर के भीतर ऐसे सार्वजनिक स्थानों की कमी महसूस होती है, जहां स्थानीय लोग और पर्यटक सहज रूप से समय बिता सकें। फतहसागर और गुलाबसागर के आसपास सुनियोजित कॉरिडोर विकसित किए जा सकते हैं, जहां लोग आराम से घूम सकें…बैठ सकें और जलाशय के सौंदर्य का आनंद ले सकें। इन कॉरिडोर के साथ लाइटिंग, बैठने की व्यवस्था और सीमित लेकिन सुव्यवस्थित फूड पॉइंट विकसित किए जा सकते हैं। शाम के समय यह स्थान शहरवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है। इससे न केवल शहर को एक नया सार्वजनिक स्पेस मिलेगा, बल्कि स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। छोटे व्यापारियों, फूड वेंडर्स, स्थानीय हस्तशिल्प और पर्यटन सेवाओं से जुड़े लोगों को सीधा लाभ मिल सकता है।
पर्यटन का सीधा संबंध स्थानीय अर्थव्यवस्था से है। जब कोई स्थान आकर्षक और व्यवस्थित होता है, तो वहां लोगों की आवाजाही बढ़ती ही है । इससे रोजगार सृजन के नए अवसर पैदा होते हैं। इसलिए जलाशयों के विकास को केवल सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधि से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। हालांकि विकास के साथ सावधानियां भी उतनी ही आवश्यक हैं। अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियां, कचरा प्रबंधन की अनदेखी और अतिक्रमण जैसी समस्याएं इन स्थानों को फिर संकट में डाल सकती हैं। इसलिए पहले से ही स्पष्ट नियम बनाए जाएं…प्लास्टिक प्रतिबंध, नियमित सफाई, सीसीटीवी निगरानी और ठोस कचरा प्रबंधन व्यवस्था सुनिश्चित हो। साथ ही नहर या अन्य स्रोतों से आने वाले पानी की गुणवत्ता पर विशेष निगरानी रखनी होगी। यदि नहरों से दूषित पानी आया, तो पूरी योजना गड्ढे में चली जाएगी। इसलिए जल गुणवत्ता की नियमित जांच और सार्वजनिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था जरूरी है।
फतहसागर और गुलाबसागर का पुनर्जीवन केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि शहर के लिए एक बड़े विजन की शुरुआत हो सकता है। यदि इसे संरक्षण, पर्यटन और रोजगार तीनों से जोड़ा जाए तो यह जोधपुर के लिए एक मॉडल परियोजना बन सकती है। अब जरूरत सिर्फ काम शुरू करने की नहीं, बल्कि दूर²ष्टि के साथ उसे पूरा करने की है। जोधपुर की जल विरासत को बचाते हुए यदि इन जलाशयों को नया जीवन मिला, तो यह आने वाली पीढिय़ों के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
sandeep.purohit@in.patrika.com