कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर को 6 औषधीय पौधों पर शोध के लिए 1.20 करोड़ रुपए की मंजूरी मिली है, जिससे पश्चिमी राजस्थान के करीब 2000 किसानों को सीधा लाभ मिलेगा।
थार का रेगिस्तान केवल रेत के धोरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह औषधीय पौधों की एक अनमोल धरोहर भी समेटे हुए है। इसी प्राकृतिक विरासत को वैज्ञानिक आधार देने और वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर ने एक अहम पहल की है।
कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर को आयुष मंत्रालय के राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड से थार क्षेत्र के छह प्रमुख औषधीय पौधों पर अनुसंधान और नई प्रजातियों के विकास के लिए 1.20 करोड़ रुपए की परियोजना स्वीकृत हुई है। यह परियोजना न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए उपयोगी सिद्ध होगी, बल्कि पश्चिमी राजस्थान के किसानों की आर्थिक उन्नति का नया रास्ता भी खोलेगी।
पश्चिमी राजस्थान पहले से ही औषधीय पौधों के हब के रूप में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां की जलवायु और मिट्टी कई दुर्लभ और उपयोगी औषधीय प्रजातियों के लिए अनुकूल मानी जाती है। अब तक इस क्षेत्र में औषधीय पौधों की खेती और संग्रहण का कार्य बिखरे और असंगठित रूप में होता रहा है, लेकिन इस नई परियोजना के माध्यम से इसे एक संगठित और वैज्ञानिक स्वरूप मिलेगा।
कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. डॉ. वी.एस. जैतावत ने बताया कि विश्वविद्यालय की पहल पर आयुष मंत्रालय से इस महत्वपूर्ण परियोजना को स्वीकृति मिली है। इस रिसर्च प्रोजेक्ट के जरिए विश्वविद्यालय का लक्ष्य लगभग 2000 किसानों तक सीधा लाभ पहुंचाने का है। इससे औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा मिलेगा और किसानों के लिए अतिरिक्त आय के स्थायी संसाधन विकसित होंगे।
परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. प्रदीप पगारिया के अनुसार, इस योजना के तहत शंखपुष्पी, अग्निमंथ, अपराजिता, अश्वगंधा और गूग्गल सहित थार की छह प्रमुख औषधीय प्रजातियों पर अनुसंधान किया जाएगा। इन पौधों की उन्नत कृषि तकनीक विकसित की जाएगी, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा।
इस परियोजना का संचालन जोधपुर मुख्यालय के साथ-साथ बाड़मेर, फलौदी और नागौर जिलों के कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किया जाएगा। इन क्षेत्रों में औषधीय पौधों के ग्रामीण संग्रहण केंद्र विकसित किए जाएंगे। साथ ही गुणवत्तायुक्त पादप सामग्री के लिए जर्म प्लाज्म सेंटर और नर्सरी की स्थापना की जाएगी।
परियोजना के अंतर्गत मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, प्रशिक्षण, प्रदर्शन, किसान भ्रमण और क्रेता-विक्रेता सम्मेलन जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। यह पहल जैव विविधता संरक्षण, थार के पर्यावरण और संस्कृति के संवर्धन के साथ-साथ किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम मानी जा रही है। आने वाले समय में थार की यह औषधीय पहचान प्रदेश और देश को नई स्वास्थ्य व आर्थिक संभावनाएं प्रदान करेगी।