
जोधपुर: अपनी गंभीर रूप से बीमार मां को बेहतर इलाज कराने के लिए बेटे ने 40 दिन की आपात पैरोल मांगी थी। उसने प्रशासन को बताया था कि मां को हार्ट और फेफड़ों की गंभीर बीमारी के साथ मधुमेह है। वह स्वयं इलाज की व्यवस्था करेगा और हर समय मां के साथ रहेगा, लेकिन पैरोल की अर्जी मंजूर नहीं हुई।
बता दें कि जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो पता चला कि बीकानेर केंद्रीय जेल में बंद महिला की बीमारी के दौरान ही मौत हो चुकी है। हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन के रवैये को असंवेदनशील बताते हुए पैरोल नियमों की समीक्षा के लिए स्वतः संज्ञान लिया है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने कहा कि गंभीर रूप से बीमार बंदी को राहत नहीं मिलना नियमों की कठोर व्याख्या का परिणाम है। अदालत ने इस संबंध में अलग जनहित प्रकृति की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।
कोर्ट ने प्रारंभिक टिप्पणी में कहा कि वर्तमान नियमों में किसी बंदी के निकट संबंधी की गंभीर बीमारी पर पैरोल का प्रावधान है, लेकिन यदि स्वयं बंदी को जीवनरक्षक उपचार की आवश्यकता हो तो स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। इस मामले में अधिवक्ता शाम्भवी मरडिया को न्याय मित्र नियुक्त किया गया है।
बीकानेर केंद्रीय जेल में बंद 57 वर्षीय मंजू देवी गंभीर हृदय, फेफड़ों और मधुमेह की बीमारी से पीड़ित थीं। उनके बेटे रविकांत स्वामी ने बेहतर इलाज के लिए जिला कलक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट, बीकानेर के समक्ष आपात पैरोल का आवेदन किया था, जिसे 16 जून 2026 को खारिज कर दिया गया। याचिका के अनुसार, मंजू देवी की हालत अत्यंत गंभीर थी और इस वर्ष उन्हें पांच दिन तक आइसीयू में भी भर्ती रखना पड़ा। सुनवाई से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।