Mosquito Control: मानसून सीजन में मच्छरों से बचने के लिए लोग जमकर मच्छर रोधी प्रोडक्ट्स पर खर्च कर रहे हैं। घरों से लेकर कमर्शियल स्थानों पर पेस्ट कंट्रोल में जमकर पैसे की बर्बादी हो रही है। ऐसे में मच्छर रोधी दवाओं का व्यापार अब लागातार बड़ा होता जा रहा है।
Mosquito Control: जोधपुर। मच्छरों ने आमजन की जेब पर डंक मार दिया है। हर महीने का बजट गड़बड़ा गया है। मानसून सीजन में प्रतिमाह 800 से 1000 रुपए तक पेस्ट कंट्रोल के उत्पादों पर खर्च होने लगा है। हर महीने करीब 10 करोड़ से ज्यादा का यह बाजार जैसे अब हर घर की जरूरत बन चुका है।
यह तब है जब सरकार के स्तर पर पेस्ट कंट्रोल के लिए अलग से संसाधन लगाए जाते हैं। जुलाई से लेकर नवंबर तक मानसून सीजन चलता है। इसमें मौसमी बीमारियां और मच्छर जनित बीमारियों के मरीज भी बढ़ते हैं। इसी कारण मच्छर नियंत्रण का खर्च भी बढ़ता है।
गृहिणी सरिता कल्ला बताती है कि बारिश के मौसम में मच्छर बढ़ने के कारण घर का जो सामान ग्रॉसरी से लिया जाता है, उसमें मच्छर नियंत्रण कॉइल और बच्चों के लिए क्रीम जैसे प्रोडक्ट लेने ही पड़ते हैं। रंजना कुमारी सिंह भी बताती है कि मानसून सीजन में यह प्रोडक्ट खरीदना मजबूरी बन गया है।
ऐसी कई कंपनियां हैं, जो पेस्ट कंट्रोल का काम करती हैं। मकान या कॉमर्शियल स्पेस का स्क्वॉयर फीट के हिसाब से चार्ज किया जाता है। 4 हजार से लेकर 10 हजार तक खर्च आता है। एक मानसून सीजन में इसे एक बार करवाना पड़ता है। जोधपुर केमिस्ट एसोसिएशन के विपुल खंडेलवाल बताते हैं कि यह प्रक्रिया हमने अपने संस्थान में अपनाई है, साल में एक बार पेस्ट कंट्रोल करवाना पड़ता है।
पेस्ट कंट्रोल के ये उत्पाद लाइसेंस कैटेगरी से बाहर हैं। इसी कारण यह दवा दुकानों व एफएमसीजी कैटेगरी दोनों में बिकते हैं। एक आकलन के अनुसार एक माह में अकेले जोधपुर में इसका बाजार 10 करोड़ से ज्यादा होता है। खास बात यह है कि पेस्ट कंट्रोल के लिए राजस्थान सरकार एएनएम और आशा सहयोगिनी दोनों को अलग बजट देती है। टेमीफॉस और अन्य साधन अपनाकर मच्छर नियंत्रण का काम किया जाता है, लेकिन इसके बावजूद मच्छर जनित बीमारियां हर साल बढ़ रही हैं।
हर महीने मच्छर नियंत्रण के उपाय तो करने ही पड़ते हैं। महीने के बजट के अलावा दूसरा बजट भी बढ़ता है। -अल्का बोहरा, गृहणी
घरेलू सामान के साथ हमें पेस्ट कंट्रोल भी करवाना पड़ता है। बीमारियों के नियंत्रण करने के लिए यह जरूरी है। इसका बजट भी अलग होता है। -राजकुमार पुरोहित, व्यापारी