जोधपुर

नई पीढ़ी भी जानेगी सिंध की सूफ, हूरमसी व पक्को कला को

लुप्त होती हस्तशिल्प कलाओं को बचाएगा ईपीसीएच हैण्डीक्राफ्ट फर्नीचर के साथ टैक्सटाइल-लेदर के विकास के लिए भी होगा काम
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Aug 26, 2018
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नई पीढ़ी भी जानेगी सिंध की सूफ, हूरमसी व पक्को कला को

जोधपुर

भले ही नई पीढी को सूफ, हूरमसी, खारक व पक्को सुनने में अजीब लगे, पर पुरानी पीढ़ी के लिए लुप्त हो रही ये हस्तशिल्प कलाएं नई नहीं है। भारत-पाक बंटवारे के समय सिन्ध से आई कशीदाकारी की सूफ, हूरमसी, खारक, मुक्के व पक्को कला को आगे बढ़ाया जा रहा है। लुप्त हो रही इन हस्तशिल्प कलाओं को एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल फोर हैण्डीक्राफ्ट्स (ईपीसीएच) जोधपुर मेगा क्लस्टर प्रोजेक्ट के तहत लुप्त होती हस्तशिल्प कलाओं के संरक्षण व संवर्धन के लिए काम करेगा। इन कलाओं के अधिकांश कलाकार बाड़मेर, जोधपुर व बीकानेर में काम कर रहे है। इसके लिए, केन्द्रीय हस्तशिल्प विकास आयुक्त विभाग की ओर से गुरू शिष्य पंरपरा के तहत कुशल आर्टिजन्स तैयार किए जाएंगे। जोधपुर के लकड़ी के हैण्डीक्राफ्ट के साथ ही, टैक्सटाइल व लेदर का भी अच्छा काम है। हैण्डीक्राफ्ट में टैक्सटाइल व लेदर का काम भी बढ़ा है और आने वाले वर्षो में इन क्षेत्रों में यह बड़ा हब होगा। इसके लिए, ईपीसीएच निर्यातकों के प्रयासों, आधुनिक तकनीकी, मशीनरी के उपयोग के साथ आर्टिजन्स को महत्व देगा।

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आर्टिजन्स से मिले, प्रोत्साहित किया

टैक्सटाइल सैक्रेटरी राघवेन्द्रसिंह, केन्द्रीय हस्तशिल्प विकास आयुक्त शांतमनु व ईपीसीएच के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर राकेशकुमार ने मेगा क्लस्टर व स्किल डवलपमेंट के तहत इन कलाओं के विकास के लिए की जा रही गतिविधियों का अवलोकन किया । इस दौरान, उन्होंने बोरानाडा में निर्माणाधीन ट्रेड फैसिलिटी सेंटर का अवलोकन किया । साथ ही, लेदर कला में राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता मोहनलाल, हॉर्न-बॉर्न में मो जाकिर सहित अन्य हस्तशिल्प कलाओं के आर्टिजन्स से मिले और उनके कार्यो की जानकारी ली।

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आर्टिजन्स को लेबर नहीं बनने दिया जाएगा, बल्कि उनकी दशा और दिशा को सुधारा जाएगा। लुप्त हो रहे आर्टिजन बेस्ड् काम को मजबूत किया जाएगा। आने वाले 10 वर्षो में चीन, विएतनाम आदि देशों से प्रतिस्पर्धा की चुनौती का सामना कर जोधपुरी हैण्डीक्राफ्ट फर्नीचर के साथ टैक्सटाल व लेदर के निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।

राकेशकुमार, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर,

ईपीसीएच

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हमारे संस्थान में करीब 11 हजार महिला कार्यकर्ता लुप्त हो रही हस्तशिल्प कलाओं पर काम कर रही है। जिनको पहचान नहीं मिल रही थी न ही हमारे उत्पाद बिक रहे थे। ईपीसीएच ने आर्टिजन्स की कला को पहचाना और एक प्लेटफॉर्म दिया। आज हमारी कला के उत्पादों की देश व विदेशों में पहचान मिली है।

विक्रमसिंह, सचिव

ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान बाड़मेर

Published on:
26 Aug 2018 09:15 pm