ऐतिहासिक, भाषाई और प्रशासनिक रूप से जिस शहर का नाम ‘फलोदी’ है, उसे राजस्थान सरकार ने अपने ही गजट नोटिफिकेशन में ‘फलौदी’ दर्ज कर दिया।
संदीप पुरोहित
हमारे यहां शहरों और स्थानों के नाम बदलने का सिलसिला नया नहीं है। फिर फलोदी के साथ अन्याय क्यों? इलाहाबाद का प्रयागराज होना, मद्रास का चेन्नई बनना, बंबई का मुंबई और कलकत्ता का कोलकाता होना— क्या इन सबका नाम परिवर्तन नहीं हुआ है। ऐसे और भी बहुत सारे उदाहरण हैं। नाम परिवर्तन कोई नया तो है नहीं। ये इतिहास, भाषा की शुद्धता और स्थानीय पहचान से जुड़े रहे हैं। कई मामलों में यह तर्क दिया गया कि औपनिवेशिक दौर में स्थानीय नामों का गलत उच्चारण प्रचलन में आ गया था, जिसे सुधारने की आवश्यकता थी।
सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कुछ नाम परिवर्तन राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित रहे हैं, पर उनका उद्देश्य सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को पुनर्स्थापित करना बताया गया। लेकिन हमारे फलोदी शहर का मामला इन सबसे अलग और कहीं अधिक चिंताजनक है। यहां नाम बदलने या सुधारने की मांग जनता से नहीं, बल्कि स्वयं सरकार की एक गंभीर त्रुटि से जुड़ी है। ऐतिहासिक, भाषाई और प्रशासनिक रूप से जिस शहर का नाम ‘फलोदी’ है, उसे राजस्थान सरकार ने अपने ही गजट नोटिफिकेशन में ‘फलौदी’ दर्ज कर दिया। जब कांग्रेस सरकार ने नए जिले बनाए थे तो 5 अगस्त, 2023 को जारी गजट नोटिफिकेशन में यह त्रुटि हो गई। यह कोई साधारण वर्तनी की गलती नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की स्मृति और शहर की पहचान से खिलवाड़ करने जैसा है।
फलोदी नाम का उल्लेख रेलवे स्टेशन, राजस्व रिकॉर्ड, पुराने नक्शों, ऐतिहासिक दस्तावेजों, लोक साहित्य और जन-व्यवहार-हर जगह स्पष्ट रूप से ‘फलोदी’ के रूप में मिलता है। स्वयं रेलवे स्टेशन का नाम आज भी ‘Phalodi’ है। वर्षों से प्रचलित इस नाम को अचानक सरकारी दस्तावेजों में बदल देना न तो भाषाई दृष्टि से उचित है और न ही प्रशासनिक रूप से तर्कसंगत।
यह प्रश्न उठता है कि जब सरकार अन्य शहरों के नाम ‘गलत उच्चारण’ के आधार पर सुधार रही है, तो फलोदी के मामले में खुद की गलती सुधारने से क्यों हिचक रही है? ‘फलौदी’ न तो स्थानीय बोली में प्रचलित है और न ही प्रमाणित है। यह केवल एक गजटीय भूल है, जो यदि समय रहते नहीं सुधारी गई, तो यही अशुद्ध नाम स्कूलों की पुस्तकों, सरकारी रिकॉर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थान पा जाएगा।
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह हमारी संस्कृति और पहचान की वाहक होती है। किसी स्थान के नाम की अशुद्धि उस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को धुंधला कर देती है। फलोदी की पहचान व्यापार, मरुस्थलीय संस्कृति और सामरिक महत्व से जुड़ी रही है। उसके नाम के साथ ऐसी लापरवाही दुर्भाग्यपूर्ण है।
गजट नोटिफिकेशन कोई अंतिम सत्य नहीं होता। पूर्व में कई राज्यों और केंद्र सरकार ने गजट में हुई त्रुटियों को स्वीकार कर उनमें संशोधन किए हैं। राजस्थान सरकार को चाहिए कि वह इस विषय को गंभीरता से ले। एक साधारण संशोधन-‘फलौदी’ को ‘फलोदी’ करने से- न केवल ऐतिहासिक सत्य की रक्षा होगी, बल्कि सरकार की संवेदनशीलता और भाषाई चेतना का भी परिचय मिलेगा।
यदि आज यह सुधार नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियां गलत नाम जानेंगी और वही गलत नाम उनका हिस्सा बन जाएगा। यह केवल एक शहर के नाम का मुद्दा नहीं है, यह प्रशासनिक सतर्कता, सांस्कृतिक सम्मान और भविष्य के प्रति जवाबदेही का प्रश्न है। समय रहते की गई एक छोटी-सी सरकारी पहल, एक बड़ी ऐतिहासिक भूल को ठीक कर सकती है। अब निर्णय सरकार के हाथ में है—वह गलती स्वीकार कर सुधार करे, या एक और अशुद्धि जोड़ दे।