मिनी सचिवालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार की एक सोच है। यदि इसे सही तरीके से लागू किया गया तो यह आम नागरिक और प्रशासन के बीच की दूरी को कम कर सकता है।
संदीप पुरोहित
सरकार की 'मिनी सचिवालय' की अवधारणा बहुत अच्छी है। राजस्थान जैसे विशाल और भौगोलिक रूप से विविध राज्य में प्रशासनिक सेवाओं को आमजन तक सहज, त्वरित और पारदर्शी रूप से पहुंचाना हमेशा एक चुनौती रहा है। इसी चुनौती के समाधान के रूप में इस योजना का मूल उद्देश्य जिला स्तर पर बिखरे हुए सरकारी कार्यालयों को एक ही परिसर में लाकर प्रशासन को अधिक प्रभावी और जन-केंद्रित बनाना है, पर दुर्भाग्य से पश्चिमी राजस्थान में एक भी मिनी सचिवालय नहीं है। लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दर-दर भटकना पड़ता है।
मिनी सचिवालय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह 'वन-स्टॉप सॉल्यूशन' के सिद्धांत पर आधारित है। आम आदमी को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी अलग-अलग विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कभी कलक्टर कार्यालय तो कभी एसपी ऑफिस, कभी समाज कल्याण विभाग तो कभी कृषि या चिकित्सा विभाग। इस प्रक्रिया में परेशानी के साथ में समय, पैसा और ऊर्जा की भी भारी बर्बादी होती है।
कलक्टर, अतिरिक्त जिला कलक्टर (एडीएम), पुलिस अधीक्षक (एसपी), समाज कल्याण विभाग, स्टांप एवं रजिस्ट्रेशन, सहकारिता विभाग, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ), कृषि विभाग, पशुपालन विभाग, वन विभाग, पीएचईडी (जलदाय विभाग), पीडब्ल्यूडी (लोक निर्माण विभाग) सहित करीब 38 महत्वपूर्ण कार्यालय एक ही जगह पर संचालित होंगे। इससे प्रशासनिक समन्वय भी बेहतर होगा और निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी। साथ ही आम आदमी को भी राहत मिलती है।
अफसोस की बात है कि प्रदेश भौगोलिक दृष्टि से सबसे बड़े क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान के किसी भी जिले या तहसील में एक भी मिनी सचिवालय नहीं है। हाल ही में पेश किए गए बजट में जयपुर के सांगानेर, अजमेर के केकड़ी, भरतपुर के नदबई और अलवर के रामगढ़ में मिनी सचिवालय के निर्माण की घोषणा की गई। हमारे हिस्से में एक भी नहीं आया तो इसकी जिम्मेदारी कहीं न कहीं हमारे क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की भी है। उन्होंने कभी मुखरता से इसके लिए आवाज ही नहीें उठाई है।
मिनी सचिवालय का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। जब सभी विभाग एक ही परिसर में होंगे, तो अधिकारियों के बीच संवाद और समन्वय आसान होगा। इससे फाइलों का निपटारा तेजी से होगा और अनावश्यक देरी की समस्या कम होगी। साथ ही आमजन को भी यह स्पष्ट रहेगा कि उनका काम किस स्तर पर लंबित है।
हमारे मारवाड़ के ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के लोगों के लिए यह एक वरदान सिद्ध होगी। यहां अक्सर देखा जाता है कि गांवों से जिला मुख्यालय तक पहुंचने में ही काफी समय और खर्च लगता है और उस पर वहां पहुंचने के बाद भी अलग-अलग कार्यालयों में भटकना पड़े तो परेशानी और बढ़ जाती है। मिनी सचिवालय इस पूरी प्रक्रिया को सरल और सुविधाजनक बना देता है। जोधपुर में तो गुडा विश्नोइयां में मिनी सचिवालय के लिए 100 बीघा भूमि चिह्नित भी की हुई है। यहां और पाली में दो-दो, जैसलमेर बाड़मेर तथा नागौर में एक एक मिनी सचिवालय की सख्त आवश्यकता है।
हालांकि, इस योजना की सफलता केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं है। प्रभावी क्रियान्वयन के साथ पारदर्शिता जरूरी है। सभी विभाग वास्तव में एक ही परिसर में शिफ्ट हों और वहां आवश्यक आधारभूत सुविधाएं यथा डिजिटल सिस्टम, प्रतीक्षालय, जन सहायता केंद्र आदि उपलब्ध हों। साथ ही कर्मचारियों और अधिकारियों की कार्यशैली में भी जनहित को प्राथमिकता देने का दृष्टिकोण होना चाहिए।
अंतत:, मिनी सचिवालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार की एक सोच है। यदि इसे सही तरीके से लागू किया गया तो यह आम नागरिक और प्रशासन के बीच की दूरी को कम कर सकता है और 'सरकार आपके द्वार' की अवधारणा को साकार कर सकता है। राजस्थान में सुशासन और जनसुविधा की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम है।
sandeep.purohit@in.patrika.com