जोधपुर के कवियों ने इंसानी फितरत, सियासत की संवेदनहीनता को साधा
जोधपुर। सूर्यनगरी जोधपुर की सबसे पुरानी साहित्यिक संस्था साहित्य संगम ने रेलवे स्टेशन क्षेत्र स्थित सेठ रघुनाथ दास परिहार धर्मशाला के सभागार में अपनी मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। इस गोष्ठी में शहर के प्रतिष्ठित कवियों ने अपनी काव्य रचनाओं की प्रस्तुति देकर इंसानी फितरत, मौजूदा दौर की विसंगतियों और सियासत की संवेदनहीनता का यथार्थ शब्दांकन किया।
संस्था के अध्यक्ष इंदीवर परिहार, जिन्होंने इस मासिक काव्य गोष्ठी का संयोजन किया। उन्होंने बताया कि नामवर शाइर व आलोचक हबीब कैफी ने इश्क पर अपनी गजल ‘जिसके चेहरे पे नूर होता है, इश्क उसको जरूर होता है’ प्रस्तुत की। कवि-आलोचक डॉ कौशलनाथ उपाध्याय ने मनुष्यता को ललकारते हुए कविता ‘मेरी खुली जिंदगी है, तुम उसमें परतों को मत ढूंढो, ढूंढ सको तो करुणा ढूंढो, प्रेम की कुछ परिभाषा ढूंढो’ सुनाई। कवि-रंग सृजक रमेश बोराणा ने सियासत पर चिंता व्यक्त करते हुए गीत ‘धुंआ-धुंआ धधक रहा जहां सारा, बाहर का युद्ध भीतर उतर आया सारा, इंसा कठपुतलियों सा क्यों नाच रहा है’ प्रस्तुत किया।
कवयित्री डॉ सूरज माहेश्वरी ने इंसान की हैसियत पर तरन्नुम में गीत ‘एक सागर सी दुनिया ये सूरज तेरी, आदमी बुलबुल और कुछ भी नहीं’ सुनाया। सैयद मुनव्वर अली ने ‘नफ़रत के इस दौर में, कैसे पनपे प्यार, ज्ञानी पंडित- मौलवी,करते जब तकरार दोहा पढ़ा और मुकेश मांडण ने जीवन दर्शन पर सार्थक कविताओं से खूब दाद हासिल की।
इसके अतिरिक्त, गोष्ठी में रंग सृजनधर्मी प्रमोद वैष्णव ने ‘सौंधी मिट्टी सा होता है बचपन…’, युवा कवि कुलदीप सिंह भाटी ने ‘मिलता जुलता होता है दुख नदियों और स्त्रियों का’, बुजुर्ग शाइर रजा मोहम्मद खान ने ‘घर का कोना मेरा खाली है…’, राजेन्द्र खिंवसरा ने ‘राजू अपनी जिंदगी लेता यूं समेट…’ तथा रंग निदेशक रमेश भाटी नामदेव ने ‘बोला बैठा रेवो देवता मरता मिनख चारा ने…’ जैसी रचनाएं प्रस्तुत कर मौजूदा हालातों की सच्चाई बयान की। इन प्रस्तुतियों को श्रोताओं ने खूब सराहा गया।
मासिक काव्य गोष्ठी में शहर के प्रतिष्ठित कवियों ने अपनी काव्य रचनाओं की प्रस्तुति देकर खूब दाद बटोरी और इंसानी फितरत, मौजूदा दौर की विसंगतियों और सियासत की संवेदनहीनता का यथार्थ शब्दांकन किया।