
नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. मेहरानगढ़ हादसे को बुधवार को एक दशक पूरा हो रहा है। आज भी 2008 के शारदीय नवरात्रा के उस ‘अ-मंगल’ दिन की यादें सालती हैं। मेहरानगढ़ के चामुण्डा मंदिर परिसर में भोर के दौरान मचे शोर, हाहाकार और रूदन की सिसकियां उन माताओं-बहनों और परिवार के सदस्यों के जेहन में गूंजती हैं। हादसे ने जो घाव छोड़े हैं उन्हें दुनिया का कोई भी मरहम नहीं भर सकता। जोधपुर के इतिहास में हुए दिल दहलाने वाले सबसे बड़े हादसे के बाद मेहरानगढ़ प्रशासन और जिला प्रशासन ने मां चामुण्डा के दर्शनार्थ आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर कई तरह के बदलाव किए हैं लेकिन पीडि़त परिवार के लोगों का कहना है कि अब सांप निकलने के बाद लकीर पीटने का कोई औचित्य नहीं है। एक दशक पूरे होने पर पत्रिका ने जब मेहरानगढ़ दुखान्तिका परिवार मंच से जुड़े लोगों से बातचीत की तो उनका दर्द फूट पड़ा। मंच के सचिव मानाराम कड़ेला ने बताया कि एक दशक पूर्व नवरात्रि स्थापना के दिन 30 सितम्बर 2008 को जब यह दुखान्तिका हुई तब इसकी निष्पक्ष जांच के लिए 2 अक्टूबर 2008 को राज्य सरकार ने न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। आयोग अध्यक्ष जस्टिस जसराज चौपड़ा ने दुखान्तिका के ढाई साल बाद 11 मई 2011 को अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन राज्य सरकार को सौंप दी थी। तब से यह रिपोर्ट परीक्षण के नाम पर गृह विभाग और विधि विभाग के ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
दोनों ही विभाग के आला अधिकारी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष पेश करना तो दूर उसका जिक्र तक करना भूल गए थे। यह राज्य सरकार की राजनीतिक मजबूरी हो या फिर ब्यूरोक्रेसी अथवा अन्य किसी का दबाव मगर दुखान्तिका में मारे गए 216 लोगों के पीडि़त परिवारजन आज भी इंसाफ की आवाज को बुलंद किए हुए हैं। कड़ेला ने बताया कि जिस दिन चौपड़ा आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी, उसी दिन से सभी पीडि़त परिजन की इंसाफ की पुकार के लिए रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए धरना-प्रदर्शन और जोधपुर से जयपुर तक पैदल मार्च और विधानसभा तक का घेराव किया। मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों की चौखट पर दस्तक दी, लेकिन सिवाय आश्वासनों के कुछ नहीं मिला। थक हार कर आखिरकार न्यायालय की शरण ली। न्यायालय की ओर से उम्मीद है कि देर से ही सहीं उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।
फैक्ट फाइल: मेहरानगढ़ हादसा
-30 सितम्बर 2008 को अलसुबह हुआ हादसा
-2 अक्टूबर 2008 को न्यायिक जांच आयोग गठित
-27 अक्टूबर 2008 को जस्टिस जसराज चौपड़ा आयोग अध्यक्ष नियुक्त
-ढाई साल तक जांच चलती रही जिस पर करीब पांच करोड़ खर्च हुए
-11 मई 2011 को जस्टिस चौपड़ा ने जांच की फाइनल 860 पृष्ठ की रिपोर्ट तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सौंपी।
-सरकारें बदल गईं, लेकिन अब तक ना तो रिपोर्ट सार्वजनिक हुई ना ही आरोप तय हुए। दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।