
संदीप पुरोहित
जोधपुर। सिलिकोसिस जैसी घातक बीमारी से परिवार के मुखिया को खो देने के बाद भी पीड़ित परिवारों का संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है। शासन और प्रशासन के स्तर पर मिलने वाली आर्थिक मदद आज भी कागजी और तकनीकी पेचीदगियों में उलझकर रह गई है, जिसके चलते अपनों को खो चुके परिवार दाने-दाने को मोहताज हैं और सरकारी मदद के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। सुनवाई के नाम पर तसल्ली के अलावा कुछ नहीं मिल रहा है। हाल यह है कि प्रदेश के करीब 500 मृतक सिलिकोसिस पीड़ितों के आश्रित अब भी मृत्यु सहायता राशि का इंतजार कर रहे हैं। इनमें सबसे अधिक 125 मामले जोधपुर जिले के हैं। वहीं प्रदेश के 450 से ज्यादा जीवित सिलिकोसिस पीड़ितों को भी स्वीकृत आर्थिक सहायता राशि अब तक जारी नहीं हो सकी है।
सिलिकोसिस से जान गंवाने वाले मजदूरों के परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं, लेकिन दस्तावेजी और तकनीकी प्रक्रियाओं में देरी के कारण उन्हें समय पर राहत नहीं मिल पा रही। विभागीय स्तर पर दस्तावेजों के सत्यापन, पोर्टल पर तकनीकी खामियों, लंबित रिकॉर्ड और अन्य औपचारिकताओं के चलते बड़ी संख्या में भुगतान अटका हुआ है।
जोधपुर के सूरसागर, कालीबेरी, केरू, बालेसर सहित पत्थर खनन क्षेत्रों में कार्य करने वाले बड़ी संख्या में मजदूर इस लाइलाज बीमारी की चपेट में आए हैं। चिकित्सा अधिकारी और रेडियोलॉजिस्ट के ऑनलाइन प्रमाणन के बाद पीडि़तों को ई-मित्र के माध्यम से आवेदन करना होता है।
3 लाख रुपए जीवित पीड़ित को सहायता
2 लाख रुपए मृत्यु उपरांत आश्रितों को सहायता
1500 रुपए मासिक पेंशन
1500 रुपए प्रतिमाह (प्रति बच्चा) बच्चों के लिए शिक्षा सहायता
पीड़ितों की पीड़ा पर नजर डालें तो प्रदेश में 500 सिलिकोसिस मृतकों के परिजनों को सहायता राशि मिलना अभी बाकी है। इनमें जोधपुर संभाग के 151 और जोधपुर जिले के 125 परिजन शामिल हैं। वहीं, 395 जीवित पीड़ितों की सहायता राशि भी लंबित है। इनमें जोधपुर संभाग के 40 और जोधपुर जिले के 25 पीड़ित शामिल हैं। इसके अलावा प्रदेश में 23 हजार पेंशनर्स और 19,400 पालनहार बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं। प्रदेश में 8,700 पालनहार परिवार भी इस योजना से जुड़े हैं।
मेरे पिता बंशीलाल (मानाराम) खदानों में काम करने के दौरान सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गए। इस बीमारी ने उनकी जिंदगी छीन ली। इसके बाद परिवार के सामने घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। मुआवजे के लिए आवेदन किया हुआ है, लेकिन अभी तक मदद नहीं मिली।
मेरे पिता रमेश को लंबे समय सिलिकोसिस के कारण काफी परेशानी झेलनी पड़ी। पिता के निधन के बाद परिवार के सामने भविष्य और आजीविका को लेकर चिंता बढ़ गई। मुआवजे के लिए आवेदन किया जा चुका है। अब परिवार को सहायता मिलने का इंतजार है।
सिलिकोसिस क्षेत्र में कार्य करने वाले विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर शिविरों के माध्यम से प्रकरणों का शीघ्र निस्तारण किया जाएगा।