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निगहबान- आरसीए चुनाव : क्रिकेट के पिच पर राजनीति का खेल कब तक?

राजस्थान में क्रिकेट प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कमी उस व्यवस्था की है जो प्रतिभा को समय पर पहचान सके, उसे सही प्रशिक्षण और अवसर दे और खिलाड़ियों के भविष्य को प्रशासनिक खींचतान से अलग रख सके।
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rajasthan cricket association

rajasthan cricket Association- Photo- Patrika

संदीप पुरोहित
राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) के चुनाव फिर होने जा रहे हैं। लंबे समय से विवाद, खींचतान और प्रशासनिक उलझनों में घिरे राजस्थान क्रिकेट के सामने इस बार सबसे बड़ा सवाल पदों का नहीं, दिशा का है। चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक 23 से 26 सितंबर तक नामांकन होंगे और 29 सितंबर को मतदान। तीन नए जिलों के जुडऩे के बाद 36 जिला संघ इस प्रक्रिया का हिस्सा होंगे और 108 लोग चुनाव लडऩे के पात्र हैं। यानी यह सिर्फ पदाधिकारियों के चयन का चुनाव नहीं, राजस्थान क्रिकेट की प्राथमिकताएं तय करने का मौका भी है।

सवाल सीधा है क्रिकेट का प्रशासन आखिर किसके हाथ में होना चाहिए? उन लोगों के, जिन्होंने मैदान पर क्रिकेट को जिया है, या उन लोगों के, जिनकी पहचान राजनीति और सत्ता के गलियारों से बनी है? क्रिकेट संघ का पहला और अंतिम उद्देश्य क्रिकेट का विकास होना चाहिए। प्रतिभाओं की तलाश, खिलाडिय़ों को बेहतर सुविधाएं, प्रशिक्षकों की उपलब्धता, मजबूत घरेलू ढांचा और राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान की टीम को प्रतिस्पर्धी बनाना, यही उसकी मूल जिम्मेदारी है। जब प्रशासन पर राजनीतिक प्रभाव हावी होता है तो खतरा यही रहता है कि क्रिकेट की जरूरतों से ज्यादा महत्व पद, प्रभाव और सत्ता के समीकरणों को मिलने लगे।

राजस्थान में यह बहस नई नहीं है। आरसीए के प्रशासन में लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव की चर्चा होती रही है। राजनेताओं और राजनीतिक परिवारों से जुड़े लोगों की सक्रियता ने स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा किया है कि क्रिकेट के फैसलों में स्वयं क्रिकेटरों और खेल प्रशासकों की भूमिका इतनी सीमित क्यों रहे? किसी बड़े राजनीतिक परिवार से जुड़ाव क्रिकेट प्रशासन की योग्यता नहीं हो सकता। न ही सत्ता प्रतिष्ठान से निकटता अपने आप में क्रिकेट चलाने की पात्रता है। क्रिकेट संघ का पद प्रतिष्ठा और प्रभाव का माध्यम नहीं, खेल की सेवा का दायित्व होना चाहिए।

हालांकि यह भी मानना होगा कि केवल पूर्व क्रिकेटर होना ही अच्छे प्रशासक की गारंटी नहीं है। एक सक्षम खेल प्रशासक में संगठन चलाने की क्षमता, वित्तीय समझ, प्रशासनिक अनुभव, पारदर्शिता और जवाबदेही भी जरूरी हैं। लेकिन निर्णय प्रक्रिया में क्रिकेट की समझ रखने वाले पूर्व खिलाडिय़ों और पेशेवर खेल प्रशासकों की मजबूत भागीदारी से खेल की वास्तविक जरूरतें बेहतर ढंग से सामने आ सकती हैं। आरसीए के सामने अब विकल्प स्पष्ट है। क्या वह पुराने सत्ता-समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता रहेगा या क्रिकेट को केंद्र में रखकर नई कार्यसंस्कृति विकसित करेगा? चुनाव की प्रक्रिया निष्पक्ष हो, जिला संघ स्वतंत्र होकर निर्णय लें और उम्मीदवार अपनी योग्यता, ²ष्टि और क्रिकेट के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर सामने आएं, यही स्वस्थ क्रिकेट प्रशासन की बुनियाद हो सकती है।

राजस्थान में क्रिकेट प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कमी उस व्यवस्था की है जो प्रतिभा को समय पर पहचान सके, उसे सही प्रशिक्षण और अवसर दे और खिलाड़ियों के भविष्य को प्रशासनिक खींचतान से अलग रख सके। इसलिए इस चुनाव से उम्मीद केवल नए पदाधिकारियों की नहीं होनी चाहिए। उम्मीद उस बदलाव की होनी चाहिए जिसमें आरसीए का केंद्र राजनीति नहीं, क्रिकेट हो; पद नहीं, प्रदर्शन हो; प्रभाव नहीं, जवाबदेही हो। मैदान पर पसीना बहाने वाले खिलाड़ी अगर प्रशासन की मेज तक अपनी आवाज नहीं पहुंचा सकते, तो क्रिकेट प्रशासन की सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आरसीए के इस चुनाव को इसी सवाल का जवाब देना होगा, राजस्थान क्रिकेट का भविष्य आखिर किसके हाथ में होगा?


sandeep.purohit@in.patrika.com

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