
जोधपुर. सीरिया के रेगिस्तान में होने वाला खजूर को जोधपुर की जमीं भी रास आ गई है। केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) की ओर से 6 साल पहले लगाई गई मेडजूल वैरायटी के फल परिपक्व अवस्था से पूर्व ही बड़े और मीठे हो गए यानी मानसून से पूर्व ही फल को डोका स्टेज में ही तोडकऱ बाजार में बेचा जा सकता है। फल पकने यानी पिंड स्टेज में आने तक मानसून की बरसात से फसल खत्म होने की आशंका रहती है।
सीरिया स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर ड्राईलैंड एग्रीकल्चर (इकार्डा) की ओर से 2014 में काजरी को खजूर की 3 किस्म के 18 पौधे दिए गए थे। इसमें से मेडजूल वैरायटी का पौधा यहां के वातावरण में घुल मिल गया है। यह पीले रंग का खजूर है। दूसरी दो वैरायटी का फल परिपक्व अवस्था से पूर्व कसैला निकला है। 6 साल बाद अब काजरी ने इस वैरायटी को थार मरुस्थल में लगाने के लिए हरी झंडी दे दी है।
एडीपी-1 भी सफल, मीठे लाल फल निकले
गुजरात के आणंद विश्वविद्यालय द्वारा सितंबर 2014 में भेजे गए खजूर की एडीपी-1 वैरायटी के 159 पौधों का भी परीक्षण सफल रहा है। इनका भी फल डोका स्टेज में ही मीठा हो गया। एक पौधे से 50 से 70 किलो खजूर मिल रहा है।
टिश्यू कल्चर बेहतर तकनीक स्थापित
काजरी के प्रधान वैज्ञानिक डॉ आरके कॉल ने बताया कि परीक्षण के बाद खजूर की टिशु कल्चर तकनीक सफल स्थापित हो गई है। एडीपी-1और मेडजूल का खजूर परिपक्व होने से पहले ही मीठा निकलने से इसे मानसून के प्रकोप से बचाया जा सकता है।
50 साल तक फल
खजूर रेगिस्तान में होता है। इसकी पत्तियां व शाखाएं चिलचिलाती धूप में और जड़े पानी में होनी चाहिए। यह 50 साल तक उपज देता है।
......................................
‘टिश्यू कल्चर तकनीक से मरुस्थल में खजूर की खेती सफल रही है। अब किसान भी इसका उपयोग कर सकते हैं।’
-डॉ ओपी यादव, निदेशक, काजरी जोधपुर