
Russia Ukraine War:घर से विदा होते समय कानपुर के 30 वर्षीय मर्चेंट नेवी के चीफ ऑफिसर सागर गुप्ता ने पत्नी और बच्चों से जल्द लौटने का वादा किया था। किसी ने नहीं सोचा था कि वह वादा हमेशा के लिए अधूरा रह जाएगा। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच काला सागर में हुए यूक्रेनी ड्रोन हमले ने कानपुर के एक खुशहाल परिवार की दुनिया उजाड़ दी। 18 जुलाई को कार्गो जहाज पर हुए हमले में सागर की मौत हो गई, लेकिन घटना के 13 दिन बाद भी उनका पार्थिव शरीर भारत नहीं पहुंच सका है। घर में बूढ़ी मां की आंखें बेटे के इंतजार में पथरा गई हैं, पत्नी हर आहट पर दरवाजे की ओर देखती हैं और सात महीने का मासूम कृष्णा अब भी अनजान है कि उसके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ चुका है।
काकादेव के शास्त्रीनगर स्थित ऊंचा पार्क के पास रहने वाले सागर गुप्ता वर्ष 2018 में डीजी शिपिंग के माध्यम से मुंबई की एक निजी नेविगेशन कंपनी में मर्चेंट नेवी के चीफ ऑफिसर बने थे। जहाज पर कप्तान के बाद चीफ ऑफिसर की जिम्मेदारी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने कम उम्र में यह मुकाम हासिल किया था। परिवार में मां रसमदेवी, पत्नी शालू, पांच वर्षीय बेटी गौरवी और सात महीने का बेटा कृष्णा हैं। पिता रूपनारायण गुप्ता का वर्ष 2005 में निधन हो चुका है।
बड़े भाई मनीष गुप्ता के अनुसार, सागर 13 जून को ड्यूटी पर जाने के लिए घर से निकले थे। तुर्किये के रास्ते वह रूस पहुंचे और काला सागर में कार्गो जहाज पर तैनात थे। 18 जुलाई को रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यूक्रेन की ओर से हुए ड्रोन हमले में जहाज में भीषण आग लग गई, जिसमें सागर की मौत हो गई। परिवार को पहले कई दिनों तक कोई सूचना नहीं मिली। 21 जुलाई को कंपनी का फोन आया और 23 जुलाई को डीजी शिपिंग ने आधिकारिक रूप से मौत की जानकारी दी। इसके बाद से परिवार सिर्फ एक इंतजार में है—सागर कब अपने घर लौटेंगे।
मनीष गुप्ता बताते हैं कि हर दिन रिश्तेदार और परिचित घर पहुंचकर परिवार को ढांढस बंधा रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है कि पार्थिव शरीर भारत कब पहुंचेगा। मां रसमदेवी हाथ में बेटे की तस्वीर लिए घंटों बैठी रहती हैं। जो भी घर आता है, वह सिर्फ एक ही बात कहती हैं—"किसी भी तरह मेरे बेटे को घर ले आओ, एक बार उसका चेहरा दिखा दो, ताकि आखिरी बार देख सकूं।"
पति को खोने का दर्द शालू के चेहरे पर साफ दिखाई देता है। गोद में सात महीने के कृष्णा और पास में बैठी पांच साल की गौरवी को देखकर उनकी आंखें बार-बार नम हो जाती हैं। उन्होंने सरकार से अपील की है कि सागर का पार्थिव शरीर जल्द से जल्द भारत लाया जाए, ताकि परिवार उन्हें पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दे सके। उनका कहना है कि अंतिम दर्शन किए बिना परिवार का दुख और गहरा होता जा रहा है।
सागर के भतीजे सक्षम ने बताया कि परिवार सहायता की उम्मीद में काकादेव थाने भी पहुंचा था। उनका कहना है कि यदि पासपोर्ट नंबर उपलब्ध हो जाए तो दिल्ली स्थित दूतावास के माध्यम से प्रक्रिया को तेज कराया जा सकता है, लेकिन अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। परिजनों का आरोप है कि मर्चेंट नेवी कंपनी और डीजी शिपिंग से लगातार संपर्क करने के बावजूद अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि सागर का पार्थिव शरीर भारत कब पहुंचेगा। ऐसे में पूरा परिवार हर दिन एक ही उम्मीद के साथ दरवाजे की ओर देख रहा है कि शायद आज उनका बेटा, पति और पिता अपने घर लौट आए।