जिले में अब भी जिंदा है बाल विवाह की कुप्रथा, अभिभावक कर रहे हैं बच्चों के भविष्य से खिलवाड़, सूचना पर प्रशासन ने रुकवाए विवाह, समाझइश देकर बताए दुष्प्रभाव, तो दोनों पक्षों ने टाली शादियां
कटनी. बचपन वह उम्र होती है, जब हाथों में किताबें, खिलौने और सपने होने चाहिए, लेकिन समाज की कुरीतियां कई बेटियों से उनका बचपन छीन लेती हैं। जिले में तमाम जागरूकता अभियानों और कानूनी सख्ती के बावजूद बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है। खासकर अक्षय तृतीया और अबूझ मुहूर्त जैसे अवसरों पर बड़ी संख्या में विवाह आयोजित होते हैं, जिनमें कई बार नाबालिग बच्चों की शादी कराने के प्रयास भी सामने आते हैं।
महिला एवं बाल विकास विभाग तथा महिला सशक्तिकरण विभाग लगातार बाल विवाह रोकने के लिए अभियान चला रहे हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार बीते छह वर्षों में जिले में 41 बाल विवाह रुकवाए गए हैं। हालांकि यह आंकड़ा इस बात की ओर इशारा करता है कि समाज के एक हिस्से में आज भी बाल विवाह को लेकर मानसिकता नहीं बदली है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक दबाव बाल विवाह के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। कई परिवार बेटियों को बोझ समझते हुए कम उम्र में उनकी शादी कर देना चाहते हैं। वहीं कुछ मामलों में सामाजिक परंपराओं और रिश्तेदारों के दबाव के चलते भी माता-पिता ऐसा कदम उठा लेते हैं।
वर्ष रोके गए बाल विवाह
2021-22 06
2022-23 09
2023-24 08
2024-25 07
2025-26 07
2026-27 04
बाल विवाह केवल एक शादी नहीं, बल्कि एक मासूम के सपनों और अधिकारों का अंत है। कम उम्र में विवाह होने के कारण बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित होता है। कई बार लड़कियां अपनी पढ़ाई बीच में छोडऩे को मजबूर हो जाती हैं और कम उम्र में घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ उठाना पड़ता है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बाल विवाह ऐसे भी होते हैं, जिनकी जानकारी प्रशासन तक नहीं पहुंच पाती। जहां जागरूक नागरिक सूचना देते हैं, वहां प्रशासन समय रहते कार्रवाई कर विवाह रुकवा देता है, लेकिन अब भी कई मामले चुपचाप संपन्न हो जाते हैं।
महिला सशक्तिकरण विभाग के मनीष तिवारी के अनुसार भारतीय कानून के तहत विवाह के लिए लडक़ी की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लडक़े की 21 वर्ष निर्धारित की गई है। इससे कम उम्र में किया गया विवाह बाल विवाह माना जाता है और यह कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।
महिला सशक्तिकरण अधिकारी वनश्री कुर्वेती का कहना है कि कम उम्र में विवाह होने से लड़कियों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। किशोरावस्था में गर्भधारण से कई शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके साथ ही शिक्षा अधूरी रह जाती है और मानसिक तनाव बढ़ जाता है। बाल वधुओं में घरेलू हिंसा और शोषण की आशंका भी अधिक रहती है। उन्होंने बताया कि इसका असर केवल लड़कियों पर ही नहीं, बल्कि लडक़ों पर भी पड़ता है। कम उम्र में परिवार की जिम्मेदारियां आने से पढ़ाई छूट जाती है और आर्थिक दबाव बढ़ता है। अपरिपक्व उम्र में जिम्मेदारियां संभालना मानसिक तनाव का कारण बनता है।
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 के तहत बाल विवाह कराना दंडनीय अपराध है। विवाह कराने वाले माता-पिता, रिश्तेदारों के साथ-साथ पंडित, बैंड संचालक, हलवाई, घोड़ी वाले और टेंट व्यवसायी तक कार्रवाई के दायरे में आते हैं। दोषी पाए जाने पर दो वर्ष तक की सजा, एक लाख रुपये तक जुर्माना या दोनों दंड दिए जा सकते हैं। वहीं बालिका को बालिग होने के बाद विवाह निरस्त कराने का अधिकार भी प्राप्त है।
समाजशास्त्री हेमलता गर्ग का कहना है कि बाल विवाह केवल पारिवारिक फैसला नहीं, बल्कि सामाजिक सोच की समस्या है। जब तक बेटियों को बोझ समझने की मानसिकता खत्म नहीं होगी, तब तक यह कुप्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकेगी। उन्होंने कहा कि बाल विवाह का असर केवल एक बच्ची तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी पीढ़ी के भविष्य को प्रभावित करता है। ऐसे में प्रशासन, समाज और परिवारों को मिलकर इस सामाजिक बुराई के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना होगा, ताकि किसी भी मासूम का बचपन समय से पहले जिम्मेदारियों के बोझ तले दब न जाए।