कटनी

जीवनदायनी बदहाल: हरे घास का मैदान बनी नदी, करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं सुधरी हालत

कागजों में सफाई, हकीकत में गंदगी का साम्राज्य, नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
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Mar 25, 2026
Horrible pollution in Katni river
Horrible pollution in Katni river

कटनी. शहर की जीवनदायिनी कटनी नदी आज बदहाली की ऐसी तस्वीर पेश कर रही है, जो जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े करती है। एक दिन की औपचारिक सफाई कर नगर निगम ने अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, लेकिन हकीकत यह है कि पूरी नदी आज गंदगी, कचरे और जलकुंभी से अटी पड़ी है। कटनी नदी, जो शहर की लगभग 80 फीसदी आबादी की प्यास बुझाने का प्रमुख स्रोत है, आज खुद ही प्रदूषण की शिकार हो चुकी है। नदी में जगह-जगह गंदे नालों का पानी सीधे गिर रहा है। पूजन सामग्री, प्लास्टिक कचरा और अन्य अपशिष्ट खुलेआम बहाए जा रहे हैं। हालत यह है कि कई स्थानों पर नदी का स्वरूप ही खत्म हो चुका है और वहां हरी घास के मैदान जैसी स्थिति नजर आ रही है।

जलकुंभी और गंदगी से ढकी सतह

नदी का बड़ा हिस्सा जलकुंभी की चपेट में है। शहर के मोहन घाट, मसुरहा घाट, गाटरघाट में जलकुंभी का साम्राज्य है। ऊपर से देखने पर पानी कम और कचरा ज्यादा दिखाई देता है। इससे न केवल जल प्रदूषण बढ़ रहा है, बल्कि आसपास के क्षेत्र में दुर्गंध और मच्छरों का प्रकोप भी तेजी से बढ़ रहा है। नगर निगम द्वारा समय-समय पर सफाई अभियान चलाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन ये दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आते हैं। एक-दो दिन की दिखावटी कार्रवाई के बाद अभियान ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। न तो नियमित सफाई हो रही है और न ही प्रदूषण रोकने के लिए कोई ठोस योजना दिखाई दे रही है।

करोड़ों खर्च, लेकिन नतीजा शून्य

कटनी नदी के सौंदर्यीकरण और रिवर फ्रंट के नाम पर कटायेघाट में 6 करोड़ रुपए से अधिक व मोहन-मसुरहा घाट में 3 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद नदी की हालत जस की तस बनी हुई है। यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ये रकम कहां खर्च हुई और इसका लाभ जनता को क्यों नहीं मिल पाया। नगर निगम के अफसरों और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता साफ दिखाई दे रही है। शहर की जीवनरेखा मानी जाने वाली नदी के संरक्षण को लेकर कोई गंभीर पहल नजर नहीं आ रही। अगर जल्द ही ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह नदी पूरी तरह नाला बनकर रह जाएगी। अब जरूरत है कि जिम्मेदार जागें, वरना यह लापरवाही शहर के भविष्य पर भारी पड़ सकती है।

Updated on:
25 Mar 2026 09:10 am
Published on:
25 Mar 2026 09:10 am