सरकारी मेडिकल कॉलेज की उम्मीद हो चुकी हैं धुंधली, निजी मॉडल पर बढ़ता रहा विवाद, सरकार के वादे पर लगा हुआ है विराम, टीएनसीपी से नहीं पास होपा नक्शा, लैंडयूज को लेकर भी गति धीमी
कटनी. जिले में प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज को लेकर सरकार व विभाग का रुख लगातार सवालों के घेरे में है। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर बनने वाले इस कॉलेज का भूमिपूजन पिछले करीब एक साल से लंबित है। 14 मार्च को बरही में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री की मौजूदगी के बावजूद इस परियोजना को सूची में शामिल नहीं किया गया। इससे पहले 27 दिसंबर और अगस्त 2025 में भी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा तथा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रस्तावित कार्यक्रम अंतिम समय में निरस्त हो चुके हैं।
यह मेडिकल कॉलेज पीपीपी मॉडल पर प्रस्तावित है, जिसमें निजी फर्म ‘स्वामी विवेकानंद फाउंडेशन’ को निर्माण व संचालन की जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन इस संस्था से जुड़ी आरकेडीएफ समूह पर भोपाल में फर्जी मार्कशीट प्रकरण के बाद विवाद खड़ा हो गया था। प्रदेश युवा कांग्रेस सचिव दिव्यांशु मिश्रा ने इसको लेकर आपत्ति दर्ज कराते हुए केंद्रीय व राज्य नेतृत्व को शिकायत भेजी है। उनका आरोप था कि विवादित संस्था को जिम्मा देना शिक्षा के व्यापारीकरण को बढ़ावा देगा, लेकिन अबतक संस्था बदलने कोई पहल नहीं हुई। अब मामला टीएनसीपी से नक्शा पास न होने, लैंड यूज न बदले जाने के कारण मामला अटका हुआ है।
पीपीपी मॉडल के तहत राज्य सरकार जमीन व जिला अस्पताल उपलब्ध कराएगी, जबकि संचालन निजी निवेशक करेंगे। कॉलेज परिसर में जिला अस्पताल सरकारी रहेगा, लेकिन अन्य सुविधाएं निजी प्रबंधन के अधीन होंगी। फीस का निर्धारण राज्य की फीस विनियामक समिति करेगी। इस मॉडल में 75 प्रतिशत बेड आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित बताए जा रहे हैं, जबकि 25 प्रतिशत बेड निजी उपयोग के लिए होंगे। आयुष्मान कार्डधारकों को मुफ्त इलाज मिलेगा, लेकिन अन्य मरीजों को निजी अस्पताल जैसी फीस चुकानी पड़ सकती है।
मेडिकल कॉलेज के लिए जिला अस्पताल को भी अनुबंधित संस्था को सौंपने की योजना है। यहीं मेडिकल छात्रों का प्रशिक्षण होगा। वर्तमान में जिला अस्पताल पहले से ही डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहा है। कई गंभीर बीमारियों के लिए मरीजों को जबलपुर, भोपाल, नागपुर, इंदौर, दिल्ली जैसे बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। कटनी के साथ-साथ मैहर, उमरिया, पन्ना और शहडोल जिलों का भार भी इसी अस्पताल पर है, जहां स्वीकृत पदों में से लगभग 50 प्रतिशत ही भरे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि बिना पर्याप्त विशेषज्ञों के मेडिकल कॉलेज का संचालन कैसे होगा।
स्थानीय स्तर पर यह मुद्दा तेजी से उभर रहा है कि जब आसपास के जिलों में शासकीय मेडिकल कॉलेज संचालित हैं, तो कटनी में भी सरकारी कॉलेज क्यों नहीं स्थापित किया जा रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि पीपीपी मॉडल में फीस अधिक होने और निजी नियंत्रण के कारण गरीब व मध्यम वर्ग के छात्रों और मरीजों पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
कटनी में मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा 2017 से चल रही है, राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2022-23 के बजट के दौरान की गई थी। इसके बाद परियोजना को पीपीपी मॉडल पर आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया, लेकिन अब तक जमीन पर काम शुरू नहीं हो सका है। स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और संगठनों की मांग है कि कटनी में पूर्णत: शासकीय मेडिकल कॉलेज स्थापित किया जाए, ताकि क्षेत्र के छात्रों को सस्ती शिक्षा और मरीजों को बेहतर व सुलभ उपचार मिल सके। फिलहाल बार-बार टलते भूमिपूजन और विवादों के चलते यह महत्वाकांक्षी परियोजना अधर में लटकी नजर आ रही है, जिससे जिलेवासियों की उम्मीदें भी कमजोर पड़ती दिख रही हैं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. राज सिंह का कहना है कि पीपीपी मोड पर मेडिकल कॉलेज निर्माण के लिए प्रक्रिया चल रही है। टीएनसीपी ले-आउट प्लान तैयार कराया जा रहा है। कलेक्ट्रेट से नक्शा स्वीकृति के लिए भेजा गया है, जैसे ही स्वीकृति होती है आगे की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
भूमि के रूपरांतरण के लिए प्रक्रिया चल रही है। अभी वह कृषि कार्य में दर्ज है। मास्टर प्लान के अनुसार एग्रीसल्चर एजुकेशन इंस्टीट्यूट के लिए आवंटित हो यह प्रोसेच चल रही है। टीएनपी के अनुसार लैंड यूज बदलते ही प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इसके बाद बिल्डर अनुमति के लिए आवेदन करेगा, उसके बाद निर्माण की प्रक्रिया शुरू होगी।