चैत्र नवरात्र विशेष: प्राचीन विरासत का प्रतीक है तिगंवा गांव, अष्टभुजी रूप में विराजी हैं मां दुर्गा, पूजन के लिए पहुंच रहे लोग
कटनी. चैत्र नवरात्र के अवसर पर बहोरीबंद विकासखंड का तिगंवा गांव इन दिनों धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक धरोहर और रहस्यमयी परंपराओं के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। जिले से लेकर आसपास के क्षेत्रों तक के श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंचकर मां कंकाली के दर्शन कर रहे हैं। प्राचीन मंदिर परिसर में सुबह से ही भक्तों की आवाजाही शुरू हो जाती है, जो दिनभर जारी रहती है। करीब 5वीं शताब्दी का यह मां कंकाली मंदिर गुप्तकालीन स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। पत्थरों से निर्मित इस मंदिर की बनावट साधारण दिखने के बावजूद बेहद सशक्त और संतुलित है। लगभग 12 फीट 9 इंच के वर्गाकार आकार में बना यह मंदिर उस दौर की निर्माण कला की परिपक्वता को दर्शाता है। इसकी छत सपाट है, जो गुप्तकालीन मंदिरों की प्रमुख विशेषता रही है। मंदिर के मुख्य द्वार के दोनों ओर गंगा और यमुना की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो उस समय की धार्मिक मान्यताओं और शिल्पकला का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती हैं। इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर मूल रूप से भगवान विष्णु को समर्पित था, जिसके प्रमाण आज भी मंदिर परिसर में मौजूद शिल्पों और मूर्तियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। गर्भगृह के समीप एक शिलापट्ट पर भगवान विष्णु की अनंत शेष पर शयन मुद्रा में प्रतिमा उकेरी गई है, जिनकी नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा विराजमान हैं। इसके अलावा कंकाली देवी और मां काली की प्रतिमाएं भी यहां अंकित हैं, जो इस स्थल के धार्मिक स्वरूप में समय के साथ हुए बदलाव की कहानी बयां करती हैं। मां कंकाली मंदिर से जुड़ी रहस्यमयी परंपराएं भी लोगों के बीच विशेष आकर्षण का विषय हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्रतिदिन तडक़े लगभग 4 बजे मां का पूजन अपने आप संपन्न हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि जब सुबह मंदिर के पट खोले जाते हैं, तो देवी का श्रृंगार और पूजा पूरी तरह संपन्न अवस्था में मिलती है, लेकिन यह कार्य कौन करता है, इसका रहस्य आज तक अनसुलझा है। यही कारण है कि नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की आस्था और भी गहरी हो जाती है।
मुख्य मंदिर के समीप स्थित एक अन्य प्राचीन मंदिर में मां दुर्गा की अष्टभुजी प्रतिमा विराजमान है, जिसे स्थानीय लोग मां शारदा के रूप में पूजते हैं। इस मंदिर का निर्माण पुराने मंदिरों के भग्नावशेषों से किया गया है, जो यहां की प्राचीनता को और अधिक स्पष्ट करता है। परिसर में बिखरी खंडित मूर्तियां और स्थापत्य अवशेष इस क्षेत्र के समृद्ध अतीत की झलक दिखाते हैं। मंदिर की दीवारों पर भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की कलात्मक आकृति भी अंकित है, जो धार्मिक और कलात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
8वीं शताब्दी का शिलालेख भी
तिगंवा की ऐतिहासिकता का एक और महत्वपूर्ण प्रमाण यहां मिला 8वीं शताब्दी का शिलालेख है, जिसमें कन्नौज के उमदेव नामक तीर्थयात्री का उल्लेख मिलता है। यह शिलालेख न केवल इस स्थान की प्राचीनता को प्रमाणित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सदियों पहले से ही यह स्थल तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध रहा है। इस प्राचीन धरोहर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। प्राचीन स्मारक और पुरातत्वीय स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत इसे राष्ट्रीय महत्व का दर्जा प्राप्त है।