17 मार्च 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बीमार जिला अस्पताल को उपचार की दरकार: डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टॉफ की कमी से जूझ रही स्वास्थ्य व्यवस्था

1100-1200 मरीजों की रोजाना ओपीडी, लेकिन स्वीकृत पदों के अनुसार नहीं है चिकित्सक व स्टॉफ, 445 पदों में से 212 पद खाली, समय मरीजों को उपचार मिल रहा ना हो पा रहे ऑपरेशन, जांचों पर भी पड़ रहा विचरीत असर

5 min read
Google source verification

कटनी

image

Balmeek Pandey

Mar 17, 2026

There is a shortage of doctors in Katni district hospital.

There is a shortage of doctors in Katni district hospital.

बालमीक पांडेय @ कटनी. जिला अस्पताल कटनी इन दिनों खुद ही ‘बीमार’ हालत में नजर आ रहा है। मरीजों के उपचार के लिए बने इस सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टॉफ की भारी कमी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है। अस्पताल में प्रतिदिन लगभग 1100 से 1200 मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं, लेकिन इस अनुपात में चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है और कई बार बिना इलाज के ही वापस लौटना पड़ता है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग से लेकर सरकार तक के दावों और वादों की पोल खुलकर सामने आ रही है।
जिला अस्पताल में मुख्य रूप से कटनी जिले के अलावा मैहर, पन्ना, उमरिया और दमोह सहित आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। इतनी बड़ी आबादी का भार होने के बावजूद यहां डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की नियुक्ति स्वीकृत पदों के अनुसार नहीं की गई है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा रिक्त पदों पर भर्ती की दिशा में भी कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है।

यह है आंकड़ों की हकीकत

अस्पताल के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुल 445 स्वीकृत पद हैं, लेकिन इनमें से केवल 233 पदों पर ही कर्मचारी पदस्थ हैं, जबकि 212 पद अभी भी रिक्त हैं। यह स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर होती व्यवस्था को साफ तौर पर दर्शाती है। नर्सिंग स्टाफ की स्थिति भी चिंताजनक है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक नर्सिंग ऑफिसर के 163 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 138 भरे हुए हैं और 25 पद खाली हैं। इसी तरह नर्सिंग ऑफिसर (पुरुष) के 15 पदों में से 5 भरे हैं और 10 पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा नर्सिंग अधीक्षक का 1 पद स्वीकृत है, लेकिन वह भी खाली है। मैट्रन के 6 पदों में से 1 ही भरा है, जबकि 5 पद रिक्त हैं। नर्सिंग सिस्टर के 7 पदों में से 3 भरे हुए हैं और 4 खाली हैं।

चतुर्थ श्रेणी की स्थिति भी चिंताजनक

चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। उदाहरण के तौर पर वार्ड बॉय के 39 पदों में से केवल 4 पद भरे हैं, जबकि 35 पद खाली हैं। इसी प्रकार स्वीपर के 14 पद स्वीकृत हैं और सभी 14 पद खाली हैं। लैब अटेंडेंट के 6 पदों में से 2 ही भरे हैं, जबकि 4 पद रिक्त हैं। आयाओं के 5 पदों में से 1 पद भरा है और 4 पद खाली हैं। इस तरह अस्पताल में सफाई व्यवस्था से लेकर वार्ड प्रबंधन तक पर कर्मचारियों की कमी का सीधा असर पड़ रहा है।

यह है चिकित्सकों की स्थिति

चिकित्सक स्वीकृत पदस्थापना रिक्त
शिशु रोग विशेषज्ञ 07 00 07
निश्चेतना विशेषज्ञ 05 03 02
मेडिकल विशेषज्ञ 05 02 03
स्त्रीरोग विशेषज्ञ 04 03 01
सर्जिकल विशेषज्ञ 05 03 02
पैथालॉजिस्ट 02 00 02
इएनटी विशेषज्ञ 02 01 01
दंत रोग विशेषज्ञ 02 01 01
चिकित्सा अधिकारी 23 14 09
आयुष अधिकारी 01 00 01

इन पदों की भी है कमी

इसी प्रकार जिला अस्पताल में 6 लिपिकों की कमी बनी हुई है। लेखापाल 3, एएसओ 1, कैशियर 1, स्टोर कीपर 1, स्टीवर्ड 1, कम्प्यूटर ऑपरेटर 3, डार्करूम असिस्टेंट 1, इलेक्ट्रीशियन एक, वाहन चालक 2, बायोकेमिस्ट 1, डायटीशियन व फिजियोथेरेपिस्ट 1-1, ओटी टैक्नीशियन कर एक पद खाली है। इसी तरह लैब टैक्टनीशियन के 5, डे्रेसर के 4, फॉर्मासिस्ट के 4 पद खाली पड़े हैं।

प्रभावित हो रहीं सेवाएं

डॉक्टरों की कमी के कारण अस्पताल की इमरजेंसी सेवाएं भी प्रभावित हो रही हैं। कई बार आपातकालीन स्थिति में भी मरीजों को तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं मिल पाते। यही नहीं, सर्जरी विभाग में भी इसका असर दिखाई दे रहा है। कई बार मेजर ऑपरेशन लंबित हो जाते हैं या डॉक्टर उन्हें टाल देते हैं, जिससे मरीजों की परेशानी और बढ़ जाती है। विकास दुबे का कहना है कि जिला अस्पताल में लगातार मरीजों का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर समस्या पर ध्यान नहीं दे रहा है। आश्चर्य की बात यह भी है कि जनप्रतिनिधियों की ओर से भी इस मुद्दे पर कोई ठोस पहल नजर नहीं आती।

प्रभावित होंगी सेवाएं

स्वास्थ्य विशेषज्ञ पूर्व सिविल सर्जन डॉ. एसके शर्मा का मानना है कि यदि जल्द ही रिक्त पदों पर भर्ती नहीं की गई तो आने वाले समय में अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाएं और अधिक प्रभावित हो सकती हैं। जिला अस्पताल, जो पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ है, उसे मजबूत करने के लिए डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टॉफ की तत्काल नियुक्ति बेहद जरूरी है।

अस्पताल में स्टॉफ की कमी से प्रभावित हो रहीं ये
सेवाएं

ओपीडी: डॉक्टर कम होने से मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है और कई मरीज बिना इलाज लौट जाते हैं, यह हर दिन की बनती है स्थिति।


इमरजेंसी सेवा: आपात स्थिति में तुरंत डॉक्टर उपलब्ध नहीं हो पाते, जिससे मरीज की हालत बिगड़ जाती है, रात में स्थित और खतरनाक होती है।


ऑपरेशन में देरी: सर्जन और स्टॉफ की कमी से मेजर व माइनर ऑपरेशन टलते या लंबित हो जाते हैं, प्रसव के मामले में अक्सर लापरवाही होती है।


वार्ड प्रबंधन: वार्ड बॉय और नर्सों की कमी से मरीजों की नियमित देखभाल में दिक्कत होती है, निजी कॉलेज की नर्सिंग छात्राएं संभाल रहीं व्यवस्थाएं।


जांच सेवाओं में देरी:
लैब स्टाफ कम होने से खून व अन्य जांच रिपोर्ट समय पर नहीं मिल पाती।


सफाई व्यवस्था खराब: स्वीपर और सफाई कर्मचारियों की कमी से अस्पताल की स्वच्छता प्रभावित होती है।


मरीजों की निगरानी में कमी: नर्सिंग स्टाफ कम होने से गंभीर मरीजों की लगातार मॉनिटरिंग नहीं हो पाती।
दवाइयों व इलाज की प्रक्रिया धीमी: पैरामेडिकल स्टॉफ कम होने से इलाज की पूरी प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।

जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने फेरा मुंह

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सहित सिविल सर्जन/जिला अस्पताल अधीक्षक की अस्पताल के संचालन, स्टाफ प्रबंधन और समस्याओं को शासन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है बावजूद इसके बेहतर प्रबंधन नहीं है। कलेक्टर जिले की प्रमुख प्रशासनिक जिम्मेदारी होने के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की मॉनिटरिंग और समाधान के प्रयास करना चाएिह, मप्र स्वास्थ्य विभाग को रिक्त पदों पर भर्ती और संसाधन उपलब्ध कराने की मुख्य जिम्मेदारी है, इसके बाद भी अनदेखी की जा रही है। स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति पर पहल नहीं कर रहे। स्थानीय विधायक संदीप जायसवाल विधानसभा में क्षेत्र की स्वास्थ्य समस्याओं को गंभीरता नहीं उठा रहे और समाधान के लिए दबाव नहीं बना पा रहे। सांसद वीडी शर्मा केंद्र और राज्य स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए पहल ठीक से नहीं कर रहे, जिला स्वास्थ्य समिति जिले की स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा कर कमियों को दूर कराने की जिम्मेदारी है, लेकिन वह भी ध्यान नहीं दे रही।

वर्जन


जिला अस्पताल में नियमित चिकित्सक 50 प्रतिशत कम हैं, विशेषज्ञों की भी कमी है, इसके कारण थोड़ा असुविधा होती है। समय-समय पर शासन को पदस्थापना के लिए पत्राचार किए जाते हैं। कई बार पत्राचार किए गए हैं। जितना स्टॉफ है उसी में ही बेहतर कार्य किया जा रहा है। मरीजों को समुचित उपचार मिले यह प्राथमिकता है।

डॉ. यशवंत वर्मा, सिविल सर्जन।